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भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता

भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता
आज़ादी के बाद देश को 15 वर्ष से भी कम समय में विकसित करने के लिए सिंचाई एवं बिजली उत्पादन के लिए बड़े बाँध, नहरें, निजी एवं सरकारी औद्योगिक क्षेत्र, आदि अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया. इसके लिए किसानों की जमीन को सरकार ने सस्ते दामों पर ले लिया. इससे असंख्य देशवासियों को अपनी कृषि भूमि एवं जंगल छोड़ मजदूरी के लिए अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा. सन 1985 में अमिया राव द्वारा लिखी गयी भारत देश के विकास की यह कहानी  कुछ सोचने पर अवश्य मजबूर करेगी.

उपरोक्त योजनाओं के कारण विस्थापन का सबसे बुरा असर घर की गृहणी पर पड़ा. प्रायः घर के अन्दर ही काम करने की अभ्यस्त औरतों को मजदूरी के लिए जब दूर-दराज़ क्षेत्रों में जाना पड़ा. इसके कारण वर्षों से चली आ रही परिवार परंपरा टूटती गयी. ऐसे में पुरुष को रोजी रोटी की व्यवस्था के लिए अपनी पत्नी-बच्चों का साथ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है. बिना किसी धरोहर, जमीन-जायदाद के अकेले मजदूरी कर बच्चों को पालना किसी भी तपस्या से कम नहीं था. भूख से पीड़ित अनेकों औरतें बड़े शहरों के वेश्यालयों में हमेशा के लिए दफ़न हो गयीं थीं. सन 1985 में अनियोजित क्षेत्र में मजदूरी करने वाली ऐसी औरतों की संख्या 7.5 करोड़ से ज्यादा थी.  
आजादी के 67 वर्ष पश्चात सन 2014 में भी देश के हरेक राज्य में कमोवेशी विकास की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. हर्ष मंदर, गौतम नवलखा आदि लेखकों ने प्रजा के निम्नतम वर्ग की पीड़ा पर भावनापूर्ण लेख लिखे हैं.

प्रश्न उठता है कि क्या आज़ादी के बाद देश के शासकों ने विकास का सही प्रतिमान चुना था ? क्या वह प्रतिमान भारतीय लोकतंत्र की परिभाषा के अनुरूप था?, जिसके अनुसार राजा अथवा शासक वर्ग ईश्वर रूपी प्रजा का सेवक है, अथवा वह अंग्रेजों का ही शासन तंत्र था, जिसे देश ने कुछ फेर-बदल कर अपना लिया था ? प्रमाण इसी ओर इंगित करते हैं कि हमारे शासकों ने पर-तंत्र अथवा दूसरों के तंत्र को चुना था तथा स्व-तंत्र अथवा भारतीय तंत्र को अपनाने का साहस नहीं किया था.  
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एवं आज़ादी के बाद भी जनता में एक नया, सुन्दर देश बनाने का जज्बा था, जिसके लिए उन्हें किसी भी त्याग के लिए तत्पर किया जा सकता था. परंतू पिछले 67 वर्षों में शासन में आये अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों का त्याग का वह जज्बा प्रोत्साहन न मिलने के कारण धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया.

राजनितिक दल चुनाव के मैदान में अपनी पार्टियों को विजयी बनाने के लिए कार्य कर रही है. पिछले कुछ महीनों से देश में एक युद्ध की स्थिति बनी हुई है. चुन के आने वाले लगभग सभी सांसद एक विजेता की भाँती संसद में प्रवेश करेंगे और फिर जनता को भूल हमेशा की भाँती अपने वर्चस्व के लिए जोड़-तोड़ में लिप्त हो जायेंगे.

भारत की राजनीती की दिशा को समझने के लिए चाणक्य के विचार बहुत उपयोगी रहे हैं. चाणक्य सीरिअल शुरू से आखिर तक शिक्षा एवं शिक्षक के मानक ही तय करता है. मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चाणक्य बालक चन्द्रगुप्त को खेलते देख प्रभावित होता है और उसे शिक्षित करने के लिए तक्षशिला गुरुकुल ले जाने का संकल्प करता है (२/८). चन्द्रगुप्त की माँ के यह कहने पर कि उसके बेटे के बारे में निर्णय लेने का अधिकार केवल उसका है, चाणक्य प्रत्युत्तर में कहता है:

"मैं उसका आचार्य हूँ, मैं इसे गर्भ में धारण कर चुका हूँ, तूने एक संभावना को जन्म दिया है, मैं उसे संभव बनाना चाहता हूँ. तू एक माँ है, तुझे अपने पुत्र के बारे में विचार करना है, मैं एक शिक्षक हूँ, मुझे राष्ट्र एवं समाज का ध्यान करना है. मेरा स्वार्थ तेरे स्वार्थ से बड़ा है."

यवनों के भारत में घुसने का मार्ग तक्षशिला से था. जब वहाँ के राजा ने यवनों से संधि कर उनकी सेना को भारत में प्रवेश करने दिया तो गुरुकुल ने निश्चय किया:

      "यदि शासन राष्ट्र के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता तो शिक्षक करेगा."
तक्षशिला के गुरुकुल में छात्रों को शस्त्र विद्या सिखाई जाती थी. राजा के विरोध में छात्रों ने गुरुकुल से निकल जन-जन को जगाने का अभियान छेड़ा. इस पर राजा ने गुरुकुल पहुँच कटाक्ष किया:

राजा: ओह ! तो अब गुरुकुल भी राजनीति से अछूता नहीं रहा.
चाणक्य: जब प्रश्न पूरे राष्ट्र का हो तो गुरुकुल उससे कैसे अछूता रह सकता है. मेरी प्रार्थना है कि आप अलक्षेन्द्र से कोई संधि न करें.
राजा: तक्षशिला मेरी भूमि है, मेरी भूमि पर पर मुझे ही आदेश देने वाले आप कौन हैं ?

राजा को चेतावनी देते हुए चाणक्य ने कहा:

      "जाओ आम्भी कुमार, एक दिन तुम्हें गुरुकुल की सत्ता का परिचय मिल ही जाएगा".
तक्षशिला के गुरुकुल में राजनीति की शिक्षा दी जाती थी. यह शास्त्र की सामर्थ्य थी जो शस्त्र को चुनौती दे रहा था.

उस समय जनपद क्षुद्र स्वार्थों के लिए आपस में लड़ रहे थे. आज देश भर की राजनीतिक पार्टियां राष्ट्र को भूल आपस में एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं. विभिन्न जनपदों को यवन आक्रमण के विरुद्ध एकजुट करने के लिए उनके मुखियाओं को प्रताड़ित करते हुए कहा:

चाणक्य: हिमालय से समुद्र पर्यंत भारत एक है. यदि कोई आपके मस्तक पर आक्रमण करे तो क्या आपके हाथ नहीं उठेंगे, क्या आपके पैर गति करना बंद कर देंगे ?

मुखियाओं ने एकजुट होना तो स्वीकार किया, परंतू किसी को भी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं था.
प्रश्न आज भी नेतृत्व का ही है, जिसके लिए एक दूसरे के प्रति विष-वमन हो रहा है. विडम्बना यह है कि आम चुनाव में यदि जनता ने किसी एक के पक्ष में निर्णय ले भी लिया तो भी यह संघर्ष थमने वाला नहीं है, बल्कि अगले पांच वर्ष यह संसद में जारी रहेगा.

जनपदों के आपसी वैमनस्य से हताश चाणक्य के उदगार:

"समस्त भारत युद्ध की विभीषिका से ग्रस्त है. वह कैसे अलक्षेन्द्र के आक्रमण का उत्तर देगा. कहीं विवाद सीमा का है, तो कहीं विवाद व्यक्तिगत स्वार्थों के संरक्षण का, कहीं जन्म की श्रेष्ठता का तो कहीं धर्म की श्रेष्ठता का. राष्ट्र पतन के कगार पर आ खड़ा है और लोगों को राष्ट्रीयता का कोई बोध नहीं, कोई गर्व नहीं कोई सम्मान नहीं."

स्थिति आज भी कोई ख़ास भिन्न नहीं है. आज भोगवादी विदेशी संस्कृति का आक्रमण है, जिसके कारण सदियों से संजोये भारतीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं. यह राष्ट्र युवा जरूर है, परन्तु नवयुवकों में नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ता जा रहा है. शासन अपने खर्चे को नियंत्रित करने का इच्छुक नहीं है. अप्रत्यक्ष करों के बोझ से पिसी जा रही जनता के कुशलक्षेम की परवाह नहीं. कोई गर्व नहीं, कोई सम्मान नहीं, क्योंकि  भोगवादी आयात के लिए विदेशों से उनकी शर्तों पर क़र्ज़ लेना एक मजबूरी.

यह कैसा लोकतंत्र हमारे शासकों ने स्वीकार किया हुआ है जिसमें शासक वर्ग हमेशा बिना प्रयोजन के संघर्ष में रत है. शिक्षक की अवहेलना की गयी और शिक्षा को धर्म से च्युत कर निरंकुश हो सत्ता का भोग किया जा रहा है.
  
Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University,
Bhopal, Madhya Pradesh
+919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal)
Email : kanhaiya@journalist.com
            Facebook : https://www.facebook.com/kanhaiya.jha.5076

शिक्षा का अधिकार 2009 एक विश्लेषण

भारत सरकार ने सन 2009  में "नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा संबंधी बाल अधिकार कानून को पुरे देश में लागू किया. इसके तहत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को नि: शुल्क व अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हुआ. इससे पहले  सन 1947 में ही शिक्षा सुविधा को कार्यान्वित करने के लिए सविंधान द्वारा सरकार को 10 वर्ष का समय भी दिया था जिसमें देश के सभी बच्चों को शिक्षा सुविधा मुहैय्या कराने की बात कही गयी थी. 1993 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक क्रांतिकारी फैसले से तत्कालीन सरकार को जगाया. न्यायालय ने कहा कि संविधान में "जीवन के अधिकार" का अर्थ तो तभी है जब व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार मिला हो. इस फैसले के तहत सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देना आवश्यक था. मजबूर होकर कांग्रेस सरकार ने सैकिया कमेटी का गठन किया जिसने 1997 में संविधान में उपयुक्त बदलाव करने का सुझाव दिया.

सन 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने संविधान में उपयुक्त बदलाव कर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया. साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता, अध्यापकों के वेतनमान, आदि अन्य सुविधाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता से बचा गया. यहाँ तक की बच्चों की शिक्षा के लिए अभिभावकों को जिम्मेवार ठहराया गया. केंद्र तथा राज्यों के बजट घाटे तथा अनावश्यक मुकदमों से बचाव को ध्यान में रखते हुए सरकार का यह एक सूझ-बूझ भरा निर्णय था.

सन 2009 के "शिक्षा अधिकार" क़ानून के विविध प्रावधानों को समझने के लिए देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को समझना होगा. साथ ही शिक्षा तंत्र से देश एवं समाज की अपेक्षाओं को भी जानना होगा. सन 2010-11 में किये गए एक सर्वे के अनुसार देश में लगभग 79 प्रतिशत सरकारी विद्यालय हैं परन्तु सरकारी विद्यालयों में अधिक खर्च, अच्छी सुविधाओं तथा अध्यापकों के अच्छे वेतनमानों के बावजूद निजी विद्यालयों के तुलना में शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी नहीं है. सरकारी विद्यालयों के अधिकाँश विद्यार्थियों को प्राइवेट ट्युशन्स में पढना पड़ता है. यहाँ तक की गाँवों में सरकारी विद्यालय होने के बावजूद माता-पिता बच्चों को निजी विद्यालयों में पढाना पसंद करते हैं.  यदि केंद्र सरकार वास्तव में कमज़ोर तथा ग्रामीण वर्ग के कल्याण की मंशा रखती है तो सुशासन के प्रति कटिबद्ध होकर सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था को सुधारना ही होगा.

उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा अधिकार क़ानून में प्रावधान किया गया है कि देश में सभी को समान शिक्षा मिले (Common School System - CSS). आज देश में ऐसे विद्यालयों की कोई कमी नहीं जहाँ आधुनिक शिक्षा के लिए 5 से 7 लाख रुपये सालाना फीस लेते हैं. इन विद्यालयों में बच्चों को आधुनिक शिक्षा प्रदान की जाती है. इसलिए क़ानून में यह प्रावधान किया गया कि प्राइवेट विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित की जायेंगी. इसके लिए सरकार उन्हें प्रति बच्चा 19000 रुपये तक का सालाना मदद भी करेगी. यह सर्वविदित है की निजी विद्यालय स्वयं  को कैसे इन कानूनों से अपने को मुक्त करने में सक्षम रहते हैं.

आज यह सोचने का विषय है कि क्या देश को CSS की आवश्यकता भी है? देश का विकास करने के लिए विभिन्न कौशल (Skill) विकास कार्यक्रम की योजना बने. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए कुछ ऐसे कौशल विकास शिक्षा कार्यक्रम हैं, जिनकी शहरी स्कूलों में शिक्षा कराने की कोई आवश्यकता नहीं है. आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा अन्य क्षेत्रों से भिन्न होनी ही चाहिए. इस बात को एक साम्य (analogy) से समझा जा सकता है. प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी मशीन है जिसके कच्चे माल में बहुत विविधता है और साथ ही तैयार माल भी अनेक प्रकार का चाहिए. देखा जाये तो राज्यों को यदि CSS से मुक्त किया जाये तो वे क्षेत्रों की आवश्यकतानुसार अपनी शिक्षा प्रणाली को बेहतर तरीके से व्यवस्थित कर सकते हैं.
 
अब ज़रा शिक्षा क़ानून-2009 पर होने वाले खर्च की समीक्षा करें. इस क़ानून के अनुसार  प्राथमिक शिक्षा में लगे सभी अध्यापकों को छठे वेतनमान आयोग की अनुशंसा के हिसाब से वेतन देना होगा. तीन वर्ष के भीतर सरकार को प्रत्येक शिशु के लिए उसके नजदीक में स्कूल उपलब्ध कराना होगा. फिर जब जबाबदेही अभिभावक की न होकर सरकार की हो तो शिक्षा तंत्र के नियंत्रण पर भी खर्च करना होगा. सरकार प्राथमिक शिक्षा के ऊपर जीडीपी का लगभग 6 प्रतिशत खर्च करती है. इस अधिकार को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के लिए सरकार को एक अनुमान के अनुसार जीडीपी का 15 प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा. राजकोष में पर्याप्त धन न होने के कारण सरकार शिक्षा में निवेश के लिए विभिन्न मार्गों की तलाश में है.

कुछ लोगों ने यह आरोप भी लगाया है कि शिक्षा अधिकार क़ानून -2009 लाकर सरकार प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलना चाहती थी. भारत में स्कूली शिक्षा क्षेत्र एक 20 लाख करोड़ रुपये का व्यवसाय है, जिसकी प्रति वर्ष वृद्धि दर भी 16 प्रतिशत है. यह एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें कीमत बढाने पर भी मांग कम नहीं होती. इसलिए यह विदेशी शिक्षा संस्थानों द्वारा निवेश के लिए उपयुक्त क्षेत्र भी था.

किसी भी देश का शिक्षा क्षेत्र व्यवसाय के अलावा भी बहुत कुछ होता है. 19 वीं शताब्दी में देश के मानस पर कब्ज़ा करने के लिए मैकॉले ने शिक्षा का ही सहारा लिया था. गांधीजी ने समाज के सात विकारों के बारे में लिखा है, जिनमें से तत्व विहीन राजनीति, बिना नीति का व्यापार, एवं चरित्र विहीन ज्ञान को इस देश में भ्रष्टाचार के रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है.

देश के प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र को विदेशी निवेश से मुक्त रखा जाए. सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन तथा गुणवत्ता को सुशासन द्वारा सुधारा जाये. देश तथा समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक शिक्षा तंत्र में आवश्यक बदलाव किया जाना आवश्यक है.


कन्हैया झा
(शोध छात्र)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश
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