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गठबंधन की सरकार नीतियों के क्रियान्वयन में बाधक


 इस चुनाव के माहौल में प्रधानमंत्री पर लिखी गयी श्री संजय बारू (लेखक) की पुस्तक बहुत चर्चा में है. लेखक यूपीए-1 के कार्यकाल में श्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे. नब्बे के दशक में श्री मनमोहन सिंह ने वित्त-मंत्री के पद पर कार्य करते हुए देश की अर्थ-व्यवस्था को लाईसेंस-परमिट राज से मुक्त किया था. यूपीए-1 के दौरान अमरीका से नाभिकीय-ऊर्जा के अनुबंध करने के समय भी उन्होनें अदम्य साहस का परिचय दिया था. उनकी ईमानदारी, देशभक्ति, कार्यकुशलता एवं सौम्य स्वभाव के कारण सभी उनका आदर करते हैं. फिर आज उनको लेकर इतना दुष्प्रचार क्यों हो रहा है ?

वास्तव में समस्या के मूल में वह शासन व्यवस्था है, जिसकी कमियाँ पिछले दो दशकों से चली आ रही साझा सरकारों के कारण पूरी तरह से उजागर हुई हैं. यूपीए-1 सरकार वाम-पंथी दलों के सहयोग से बनी थी, जो पूंजीवादी अमरीका को अपना घोर शत्रु मानते हैं. शासन चलाने के लिए कुछ लक्ष्मण-रेखायें तय की गयीं, जिसके लिए दोनों ही ओर से कुछ उदारवादी रुख अपनाए गए थे. देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अणु-ऊर्जा के विकल्प को अपनाने का विचार किया. परंतू सन 1998 के अणु-बम विस्फोट के कारण, अमरीकी पाबंदियों के चलते, विश्व का कोई भी देश भारत को नाभिकीय-ईंधन देने को तैयार नहीं था.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह से बहुत प्रभावित थे. सन 2005  में क्रेमलिन में हो रहे एक समारोह में जॉर्ज बुश एवं उनकी पत्नि लौरा अपनी सीट से उठे और श्री मनमोहन सिंह एवं उनकी पत्नि को संबोधित करते हुए उन्होनें कहा:

"लौरा ! तुम भारतीय प्रधानमंत्री से मिलो. तुम जानती हो कि 100 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाला भारत एक प्रजातंत्र है, जिसमें अनेक मतों एवं अनेक भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं. इनकी अर्थ-व्यवस्था भी प्रगति पर है, और यह व्यक्ति इस देश को नेतृत्व दे रहा है."

शुरू में अमरीकी राष्ट्रपति आदर से श्री मनमोहन सिंह को 'सर' कहकर बुलाते थे. बाद में जब श्री बुश भारत आये तो एक दोस्त की तरह से वे श्री मनमोहन सिंह के कंधे पर हाथ रख कर चलते देखे गए थे. इन  दोनों नेताओं के व्यक्तिगत प्रयासों से ही दोनों ही देशों में अनेकों प्रशासनिक बाधाओं के बावजूद नाभिकीय-अनुबंध का प्रारूप संसद की मंजूरी के लिए तैयार था.

भारत ने सन 1974 में पहला परमाणु-बम विस्फोट किया था. तभी से भारत पर नाभिकीय अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करने का अमरीकी दबाव था. भारत यह हस्ताक्षर नहीं करना चाहता था, क्योंकि वह चीन की ही भांति नाभिकीय अस्त्रों को विकसित करने के अपने विकल्प को कायम रखना चाहता था. इस अनुबंध से अमरीका भारत के लिए एक अपवाद (exception) बना रहा था. इस प्रकार भारत के लिए अपने प्रति पिछले चार दशकों से चले आ रहे भेद-भाव को हमेशा के लिए ख़त्म करने का यह एक सुनहरा मौक़ा था.

इसी बीच वाम-पंथी दलों में नेतृत्व परिवर्तन से पार्टी में कट्टरवादी लोगों का वर्चस्व हो गया. उन्होनें नाभिकीय अनुबंध के विरोध को जनता के समक्ष ले जाने के लिए प्रेस-वार्ता का आयोजन किया, जबकि प्रधानमन्त्री ने इस विषय पर संसद में वक्तव्य दिया था. साथ ही उन्होनें सभी पार्टियों के नेताओं को अपने निवास-स्थान पर बात-चीत के लिए आमंत्रित किया, जहां पर प्रशासनिक अधिकारियों ने अनुबंध का पूरा विवरण उनके सम्मुख रखा. वाम-पंथियों द्वारा मुद्दे को जनता के बीच ले जाने का कोई औचित्य नहीं था.

यह देश विविधताओं से भरा हुआ है. जनता से यह अपेक्षा करना कि वह संसद में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दे पाएगी, मुश्किल है. साझा सरकार में यदि सभी पार्टियां अपनी विचारधारा पर अड़ी रहेंगी तो शासन नहीं चल सकेगा. विचारधारा तो साझे में सबसे बड़े घटक की ही चलनी चाहिए, क्योंकि सबसे अधिक मत देकर जनता ने उसकी विचारधारा का अनुमोदन किया है. हाँ ! यदि क्रियान्वन में कहीं भ्रष्टाचार होता है तो अवश्य ही ऐसी सरकार को गिरा देनी चाहिए.

Kanhaiya Jha
(Ph.d Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University,
Bhopal, Madhya Pradesh
+919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal)
Email : kanhaiya@journalist.com
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भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता

भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता
आज़ादी के बाद देश को 15 वर्ष से भी कम समय में विकसित करने के लिए सिंचाई एवं बिजली उत्पादन के लिए बड़े बाँध, नहरें, निजी एवं सरकारी औद्योगिक क्षेत्र, आदि अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया. इसके लिए किसानों की जमीन को सरकार ने सस्ते दामों पर ले लिया. इससे असंख्य देशवासियों को अपनी कृषि भूमि एवं जंगल छोड़ मजदूरी के लिए अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा. सन 1985 में अमिया राव द्वारा लिखी गयी भारत देश के विकास की यह कहानी  कुछ सोचने पर अवश्य मजबूर करेगी.

उपरोक्त योजनाओं के कारण विस्थापन का सबसे बुरा असर घर की गृहणी पर पड़ा. प्रायः घर के अन्दर ही काम करने की अभ्यस्त औरतों को मजदूरी के लिए जब दूर-दराज़ क्षेत्रों में जाना पड़ा. इसके कारण वर्षों से चली आ रही परिवार परंपरा टूटती गयी. ऐसे में पुरुष को रोजी रोटी की व्यवस्था के लिए अपनी पत्नी-बच्चों का साथ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है. बिना किसी धरोहर, जमीन-जायदाद के अकेले मजदूरी कर बच्चों को पालना किसी भी तपस्या से कम नहीं था. भूख से पीड़ित अनेकों औरतें बड़े शहरों के वेश्यालयों में हमेशा के लिए दफ़न हो गयीं थीं. सन 1985 में अनियोजित क्षेत्र में मजदूरी करने वाली ऐसी औरतों की संख्या 7.5 करोड़ से ज्यादा थी.  
आजादी के 67 वर्ष पश्चात सन 2014 में भी देश के हरेक राज्य में कमोवेशी विकास की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. हर्ष मंदर, गौतम नवलखा आदि लेखकों ने प्रजा के निम्नतम वर्ग की पीड़ा पर भावनापूर्ण लेख लिखे हैं.

प्रश्न उठता है कि क्या आज़ादी के बाद देश के शासकों ने विकास का सही प्रतिमान चुना था ? क्या वह प्रतिमान भारतीय लोकतंत्र की परिभाषा के अनुरूप था?, जिसके अनुसार राजा अथवा शासक वर्ग ईश्वर रूपी प्रजा का सेवक है, अथवा वह अंग्रेजों का ही शासन तंत्र था, जिसे देश ने कुछ फेर-बदल कर अपना लिया था ? प्रमाण इसी ओर इंगित करते हैं कि हमारे शासकों ने पर-तंत्र अथवा दूसरों के तंत्र को चुना था तथा स्व-तंत्र अथवा भारतीय तंत्र को अपनाने का साहस नहीं किया था.  
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एवं आज़ादी के बाद भी जनता में एक नया, सुन्दर देश बनाने का जज्बा था, जिसके लिए उन्हें किसी भी त्याग के लिए तत्पर किया जा सकता था. परंतू पिछले 67 वर्षों में शासन में आये अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों का त्याग का वह जज्बा प्रोत्साहन न मिलने के कारण धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया.

राजनितिक दल चुनाव के मैदान में अपनी पार्टियों को विजयी बनाने के लिए कार्य कर रही है. पिछले कुछ महीनों से देश में एक युद्ध की स्थिति बनी हुई है. चुन के आने वाले लगभग सभी सांसद एक विजेता की भाँती संसद में प्रवेश करेंगे और फिर जनता को भूल हमेशा की भाँती अपने वर्चस्व के लिए जोड़-तोड़ में लिप्त हो जायेंगे.

भारत की राजनीती की दिशा को समझने के लिए चाणक्य के विचार बहुत उपयोगी रहे हैं. चाणक्य सीरिअल शुरू से आखिर तक शिक्षा एवं शिक्षक के मानक ही तय करता है. मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चाणक्य बालक चन्द्रगुप्त को खेलते देख प्रभावित होता है और उसे शिक्षित करने के लिए तक्षशिला गुरुकुल ले जाने का संकल्प करता है (२/८). चन्द्रगुप्त की माँ के यह कहने पर कि उसके बेटे के बारे में निर्णय लेने का अधिकार केवल उसका है, चाणक्य प्रत्युत्तर में कहता है:

"मैं उसका आचार्य हूँ, मैं इसे गर्भ में धारण कर चुका हूँ, तूने एक संभावना को जन्म दिया है, मैं उसे संभव बनाना चाहता हूँ. तू एक माँ है, तुझे अपने पुत्र के बारे में विचार करना है, मैं एक शिक्षक हूँ, मुझे राष्ट्र एवं समाज का ध्यान करना है. मेरा स्वार्थ तेरे स्वार्थ से बड़ा है."

यवनों के भारत में घुसने का मार्ग तक्षशिला से था. जब वहाँ के राजा ने यवनों से संधि कर उनकी सेना को भारत में प्रवेश करने दिया तो गुरुकुल ने निश्चय किया:

      "यदि शासन राष्ट्र के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता तो शिक्षक करेगा."
तक्षशिला के गुरुकुल में छात्रों को शस्त्र विद्या सिखाई जाती थी. राजा के विरोध में छात्रों ने गुरुकुल से निकल जन-जन को जगाने का अभियान छेड़ा. इस पर राजा ने गुरुकुल पहुँच कटाक्ष किया:

राजा: ओह ! तो अब गुरुकुल भी राजनीति से अछूता नहीं रहा.
चाणक्य: जब प्रश्न पूरे राष्ट्र का हो तो गुरुकुल उससे कैसे अछूता रह सकता है. मेरी प्रार्थना है कि आप अलक्षेन्द्र से कोई संधि न करें.
राजा: तक्षशिला मेरी भूमि है, मेरी भूमि पर पर मुझे ही आदेश देने वाले आप कौन हैं ?

राजा को चेतावनी देते हुए चाणक्य ने कहा:

      "जाओ आम्भी कुमार, एक दिन तुम्हें गुरुकुल की सत्ता का परिचय मिल ही जाएगा".
तक्षशिला के गुरुकुल में राजनीति की शिक्षा दी जाती थी. यह शास्त्र की सामर्थ्य थी जो शस्त्र को चुनौती दे रहा था.

उस समय जनपद क्षुद्र स्वार्थों के लिए आपस में लड़ रहे थे. आज देश भर की राजनीतिक पार्टियां राष्ट्र को भूल आपस में एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं. विभिन्न जनपदों को यवन आक्रमण के विरुद्ध एकजुट करने के लिए उनके मुखियाओं को प्रताड़ित करते हुए कहा:

चाणक्य: हिमालय से समुद्र पर्यंत भारत एक है. यदि कोई आपके मस्तक पर आक्रमण करे तो क्या आपके हाथ नहीं उठेंगे, क्या आपके पैर गति करना बंद कर देंगे ?

मुखियाओं ने एकजुट होना तो स्वीकार किया, परंतू किसी को भी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं था.
प्रश्न आज भी नेतृत्व का ही है, जिसके लिए एक दूसरे के प्रति विष-वमन हो रहा है. विडम्बना यह है कि आम चुनाव में यदि जनता ने किसी एक के पक्ष में निर्णय ले भी लिया तो भी यह संघर्ष थमने वाला नहीं है, बल्कि अगले पांच वर्ष यह संसद में जारी रहेगा.

जनपदों के आपसी वैमनस्य से हताश चाणक्य के उदगार:

"समस्त भारत युद्ध की विभीषिका से ग्रस्त है. वह कैसे अलक्षेन्द्र के आक्रमण का उत्तर देगा. कहीं विवाद सीमा का है, तो कहीं विवाद व्यक्तिगत स्वार्थों के संरक्षण का, कहीं जन्म की श्रेष्ठता का तो कहीं धर्म की श्रेष्ठता का. राष्ट्र पतन के कगार पर आ खड़ा है और लोगों को राष्ट्रीयता का कोई बोध नहीं, कोई गर्व नहीं कोई सम्मान नहीं."

स्थिति आज भी कोई ख़ास भिन्न नहीं है. आज भोगवादी विदेशी संस्कृति का आक्रमण है, जिसके कारण सदियों से संजोये भारतीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं. यह राष्ट्र युवा जरूर है, परन्तु नवयुवकों में नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ता जा रहा है. शासन अपने खर्चे को नियंत्रित करने का इच्छुक नहीं है. अप्रत्यक्ष करों के बोझ से पिसी जा रही जनता के कुशलक्षेम की परवाह नहीं. कोई गर्व नहीं, कोई सम्मान नहीं, क्योंकि  भोगवादी आयात के लिए विदेशों से उनकी शर्तों पर क़र्ज़ लेना एक मजबूरी.

यह कैसा लोकतंत्र हमारे शासकों ने स्वीकार किया हुआ है जिसमें शासक वर्ग हमेशा बिना प्रयोजन के संघर्ष में रत है. शिक्षक की अवहेलना की गयी और शिक्षा को धर्म से च्युत कर निरंकुश हो सत्ता का भोग किया जा रहा है.
  
Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
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' कार वालों पर मेहरबान सरकार'

अभी हाल में सत्र 2014-15 के लिए पेश किये गए अंतरिम बजट में कारों पर टैक्स कम कर वित्त मंत्री ने 'कार-सेवा' ही की है. यह भी तब जब कि देश के मध्य एवं उच्च वर्ग की सेवा के लिए विश्व के अनेक कार निर्माता स्वयं यहाँ पर कारें बनाने को आतुर हैं. राष्ट्रीय शहरी यातायात नीति (NUTP) भी निजी वाहनों की जगह सार्वजनिक परिवहन के प्रयोग को प्राथमिकता देती है. कारों की खरीद के लिए पैसों की व्यवस्था में भी सरकार ने कुछ योगदान किया. कुछ महीने पहले सरकार ने सातवें वेतन आयोग का गठन कर वास्तव में 'कार सेवा' ही की थी. मध्य वर्ग के लिए कार रखना एक Status Symbol है.     'टेरी' (१) के एक अध्ययन के अनुसार मुख्यतः उच्च-मध्य वर्ग परिवारों में आय बढने के साथ-साथ एक से अधिक कारें रखना सुविधा से अधिक जरूरत बन जाती है.   
     
    पिछले दस वर्षों में दिल्ली सरकार की उपलब्धियों में अनेकों फ्लाई-ओवर्स, पार्किंग स्थल आदि का निर्माण गिनाया जाता है. परंतू नयी कारों के रजिस्ट्रेशन पर कोई नियंत्रण न करने से आज भी सड़कों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति वैसी ही बनी हुई है. जापान जैसे समृद्ध देश में भी नयी कार का रजिस्ट्रेशन तभी किया जाता है जब  कार मालिक पार्किंग सुविधा का प्रमाण देता है. सिंगापुर एवं हाँगकॉंग जैसे समृद्ध शहरी देशों का कुल उत्पाद दिल्ली तथा चेन्नई से कहीं ज्यादा होने पर भी कारों की संख्या कम है. भारत के प्रतिस्पर्धी चीन ने भी अपने अनेक बड़े शहरों में कार रजिस्ट्रेशन का कोटा तय किया हुआ है. दिल्ली और बंगलौर में लगभग तीस हज़ार कारें प्रति-माह रजिस्टर होती हैं जबकि शंघाई शहर में केवल 7 से 8 हज़ार देश के अनेक बड़े शहर बड़ी तेज़ी से दिल्ली एवं बंगलौर की बराबरी पर पहुँच रहे हैं.
    
      देश पेट्रोलियम पदार्थों की अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. यदि कारों की संख्या में इसी तरह की वृद्धि होती रही तो अगले 15 वर्षों में आयात पर यह निर्भरता बढ़ कर 90 प्रतिशत हो जायेगी. खाड़ी देशों की अस्थिरता के चलते देश के लिए यह एक बड़ी समस्या बन सकती है.

     देश में महंगाई का मुख्य कारण देसी एवं विदेशी बजट का घाटा है. विदेशी बजट घाटे में पेट्रोलियम पदार्थों के आयात का, जो कि कुल आयात का लगभग एक तिहाई होता है, मुख्य योगदान रहता है. जिस तेज़ी से निर्यात बढ़ता है उससे कहीं अधिक तेज़ी से आयात बढ़ जाता है. रुपये के अवमूल्यन से भी विदेशी बजट घाटा बढ़ता है. निर्यात बढाने के लिए खनन का सहारा लेना पड़ता है, जिसके वैध और उससे कहीं ज्यादा अवैध खनन से गाँव उजडते हैं, जंगल कटते हैं और साथ ही देश की संपत्ति का भी निर्यात हो जाता है. विकास के लिए खनिज पदार्थ संपदा से कम नहीं होते हैं.

     देसी घाटे का मुख्य कारण भ्रष्टाचार है, जिसमें टैक्स की चोरी, योजनाओं में भ्रष्टाचार आदि अनेक बिन्दु शामिल हैं. इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार देश के सार्वजनिक संस्थानों में अपने शेयर्स बेचती है, जिसे खरीदने में निजी पूंजी के अलावा विदेशी पूंजी भी शामिल रहती है. यह भी एक प्रकार से घाटा पूरा करने के लिए देश की संपदा को बेचना ही है.   

     इस देश की अधिकांश जनता 'बे-कार' अथवा बिना कार वाली है. अनियोजित क्षेत्रों में काम करने वाली यह जनता महंगाई से सबसे अधिक प्रभावित होती है, क्योंकि इसे कोई महंगाई भत्ता नहीं मिलता. काश इस देश की गरीब जनता को इन विषयों की समझ होती अथवा मई 2014 में जनता के नाम पर नए राज्य करने वालों में ईश्वर कुछ भावुकता पैदा करे.   

(१)               'टेरी' The Energy and Resources Institute, TERI


शिक्षा का अधिकार 2009 एक विश्लेषण

भारत सरकार ने सन 2009  में "नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा संबंधी बाल अधिकार कानून को पुरे देश में लागू किया. इसके तहत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को नि: शुल्क व अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हुआ. इससे पहले  सन 1947 में ही शिक्षा सुविधा को कार्यान्वित करने के लिए सविंधान द्वारा सरकार को 10 वर्ष का समय भी दिया था जिसमें देश के सभी बच्चों को शिक्षा सुविधा मुहैय्या कराने की बात कही गयी थी. 1993 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक क्रांतिकारी फैसले से तत्कालीन सरकार को जगाया. न्यायालय ने कहा कि संविधान में "जीवन के अधिकार" का अर्थ तो तभी है जब व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार मिला हो. इस फैसले के तहत सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देना आवश्यक था. मजबूर होकर कांग्रेस सरकार ने सैकिया कमेटी का गठन किया जिसने 1997 में संविधान में उपयुक्त बदलाव करने का सुझाव दिया.

सन 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने संविधान में उपयुक्त बदलाव कर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया. साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता, अध्यापकों के वेतनमान, आदि अन्य सुविधाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता से बचा गया. यहाँ तक की बच्चों की शिक्षा के लिए अभिभावकों को जिम्मेवार ठहराया गया. केंद्र तथा राज्यों के बजट घाटे तथा अनावश्यक मुकदमों से बचाव को ध्यान में रखते हुए सरकार का यह एक सूझ-बूझ भरा निर्णय था.

सन 2009 के "शिक्षा अधिकार" क़ानून के विविध प्रावधानों को समझने के लिए देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को समझना होगा. साथ ही शिक्षा तंत्र से देश एवं समाज की अपेक्षाओं को भी जानना होगा. सन 2010-11 में किये गए एक सर्वे के अनुसार देश में लगभग 79 प्रतिशत सरकारी विद्यालय हैं परन्तु सरकारी विद्यालयों में अधिक खर्च, अच्छी सुविधाओं तथा अध्यापकों के अच्छे वेतनमानों के बावजूद निजी विद्यालयों के तुलना में शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी नहीं है. सरकारी विद्यालयों के अधिकाँश विद्यार्थियों को प्राइवेट ट्युशन्स में पढना पड़ता है. यहाँ तक की गाँवों में सरकारी विद्यालय होने के बावजूद माता-पिता बच्चों को निजी विद्यालयों में पढाना पसंद करते हैं.  यदि केंद्र सरकार वास्तव में कमज़ोर तथा ग्रामीण वर्ग के कल्याण की मंशा रखती है तो सुशासन के प्रति कटिबद्ध होकर सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था को सुधारना ही होगा.

उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा अधिकार क़ानून में प्रावधान किया गया है कि देश में सभी को समान शिक्षा मिले (Common School System - CSS). आज देश में ऐसे विद्यालयों की कोई कमी नहीं जहाँ आधुनिक शिक्षा के लिए 5 से 7 लाख रुपये सालाना फीस लेते हैं. इन विद्यालयों में बच्चों को आधुनिक शिक्षा प्रदान की जाती है. इसलिए क़ानून में यह प्रावधान किया गया कि प्राइवेट विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित की जायेंगी. इसके लिए सरकार उन्हें प्रति बच्चा 19000 रुपये तक का सालाना मदद भी करेगी. यह सर्वविदित है की निजी विद्यालय स्वयं  को कैसे इन कानूनों से अपने को मुक्त करने में सक्षम रहते हैं.

आज यह सोचने का विषय है कि क्या देश को CSS की आवश्यकता भी है? देश का विकास करने के लिए विभिन्न कौशल (Skill) विकास कार्यक्रम की योजना बने. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए कुछ ऐसे कौशल विकास शिक्षा कार्यक्रम हैं, जिनकी शहरी स्कूलों में शिक्षा कराने की कोई आवश्यकता नहीं है. आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा अन्य क्षेत्रों से भिन्न होनी ही चाहिए. इस बात को एक साम्य (analogy) से समझा जा सकता है. प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी मशीन है जिसके कच्चे माल में बहुत विविधता है और साथ ही तैयार माल भी अनेक प्रकार का चाहिए. देखा जाये तो राज्यों को यदि CSS से मुक्त किया जाये तो वे क्षेत्रों की आवश्यकतानुसार अपनी शिक्षा प्रणाली को बेहतर तरीके से व्यवस्थित कर सकते हैं.
 
अब ज़रा शिक्षा क़ानून-2009 पर होने वाले खर्च की समीक्षा करें. इस क़ानून के अनुसार  प्राथमिक शिक्षा में लगे सभी अध्यापकों को छठे वेतनमान आयोग की अनुशंसा के हिसाब से वेतन देना होगा. तीन वर्ष के भीतर सरकार को प्रत्येक शिशु के लिए उसके नजदीक में स्कूल उपलब्ध कराना होगा. फिर जब जबाबदेही अभिभावक की न होकर सरकार की हो तो शिक्षा तंत्र के नियंत्रण पर भी खर्च करना होगा. सरकार प्राथमिक शिक्षा के ऊपर जीडीपी का लगभग 6 प्रतिशत खर्च करती है. इस अधिकार को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के लिए सरकार को एक अनुमान के अनुसार जीडीपी का 15 प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा. राजकोष में पर्याप्त धन न होने के कारण सरकार शिक्षा में निवेश के लिए विभिन्न मार्गों की तलाश में है.

कुछ लोगों ने यह आरोप भी लगाया है कि शिक्षा अधिकार क़ानून -2009 लाकर सरकार प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलना चाहती थी. भारत में स्कूली शिक्षा क्षेत्र एक 20 लाख करोड़ रुपये का व्यवसाय है, जिसकी प्रति वर्ष वृद्धि दर भी 16 प्रतिशत है. यह एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें कीमत बढाने पर भी मांग कम नहीं होती. इसलिए यह विदेशी शिक्षा संस्थानों द्वारा निवेश के लिए उपयुक्त क्षेत्र भी था.

किसी भी देश का शिक्षा क्षेत्र व्यवसाय के अलावा भी बहुत कुछ होता है. 19 वीं शताब्दी में देश के मानस पर कब्ज़ा करने के लिए मैकॉले ने शिक्षा का ही सहारा लिया था. गांधीजी ने समाज के सात विकारों के बारे में लिखा है, जिनमें से तत्व विहीन राजनीति, बिना नीति का व्यापार, एवं चरित्र विहीन ज्ञान को इस देश में भ्रष्टाचार के रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है.

देश के प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र को विदेशी निवेश से मुक्त रखा जाए. सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन तथा गुणवत्ता को सुशासन द्वारा सुधारा जाये. देश तथा समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक शिक्षा तंत्र में आवश्यक बदलाव किया जाना आवश्यक है.


कन्हैया झा
(शोध छात्र)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश
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