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नयी सरकार की चुनौतियां

राजनैतिक दलों ने अपने घोषणा-पत्र में कई महत्वाकांक्षी योजनाओं का जिक्र किया है, जिनके लिए बजट में धन की व्यवस्था करना एक चुनौती होगी. केंद्र सरकार एक वर्ष में लगभग 15 लाख करोड़ रुपये  खर्च करती है, जबकि करों आदि से सरकार को केवल 9.4 लाख करोड़ रुपये प्राप्त होता है. यदि सरकार की आमदनी को 100 रुपये मानें तो सरकार का खर्च 160 रुपये होता है, जिसके लिए वह हर साल 60 रुपये बाज़ार से उधार लेती है. बाज़ार से लिए उधार पर सरकार हर वर्ष केवल ब्याज दे पाती है.

सरकार के कुल खर्च को यदि 100 रुपये मानें तो केवल 33 रुपये योजना खर्च (प्लान) के लिए होता है. बाकी 67 रुपये अनियोजित खर्चों जैसे वेतन, पुरानी योजनाओं के रख-रखाव आदि के लिए होते हैं.

योजनाओं को लागू करने के लिए अनियोजित खर्चों को कम करना नयी सरकार के लिए एक चुनौती होगी. इस खर्चे के मुख्य तीन मद ब्याज, अनुदान तथा रक्षा-तंत्र हैं. वित्त वर्ष 2013-14 के अंत तक सरकार की कुल देन-दारी लगभग 56 लाख करोड़ रुपये थी, जो पिछले कई वर्षों से 5-6 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष की दर से बढ़ती जा रही है. इस देन-दारी की वजह से अनियोजित खर्च का लगभग 33 प्रतिशत केवल ब्याज चुकाने पर लग जाता है. कीमतों को स्थिर रखने के लिए सरकार खाद्य पदार्थों, उर्वरक, तथा पेट्रोलियम पर अनुदान देती है. नयी सरकार यदि रक्षा मंत्रालय के खर्चे को कम करती है तो उसे संसद में भीषण विरोध का सामना करना पडेगा. उपरोक्त तीनों मदों को जोड़ा जाय तो सरकार के पास अनियोजित खर्च के मद में केवल 27 प्रतिशत बचता है, जिसमें से उसे सरकारी कर्मचारियों को वेतन देना होता है. महंगाई भत्ते आदि के इसमें लगातार वृद्धि होती रहती है. फिर नए वेतन आयोग का भी गठन किया जा चुका है, जिसकी विभीषिका भी अगली सरकार ही झेलेगी.  

प्रायः अनियोजित खर्चा अनुमान से अधिक हो जाता है. इसके अलावा सरकार कर-संग्रहण भी अनुमान से कम कर पाती है. बाज़ार से उधार के लिए निकाले गए बांड्स भी पूरी तरह निवेशित नहीं हो पाते. इन तीनों कारणों से योजना खर्च को और कम करना पड़ता है. वित्त-वर्ष 2012-13 में योजना खर्च में लगभग 21 प्रतिशत की कमी करनी पडी.

वित्त वर्ष 2014-15 के लिए अंतरिम बजट पेश करते हुए केन्द्रीय वित्त-मंत्री की कुछ घोषणाएं इस प्रकार से थीं:-


  • वित्त वर्ष 2013-14 के कर-संग्रह में लगभग 70 हज़ार करोड़ का घाटा होने की संभावना है जिसे बाज़ार से उधार लेकर पूरा किया जाएगा.
  • पेट्रोलियम अनुदान के 35 हज़ार करोड़ रुपये की देनदारी जो वित्त-वर्ष 2013-14 में देनी थी उसका भुगतान वित्त वर्ष 2014-15 में किया जाएगा.
  • वित्त-वर्ष 2014-15 में योजना खर्च उतना ही रखा गया है जितना की वर्ष 2013-14 में था.
प्रतिवर्ष सरकार करों से लगभग 15 प्रतिशत अधिक आमदनी करती है. फिर राज्य सरकारें अलग से अपने कर लगाती हैं. इस सबसे महंगाई बढ़ती है, जो योजनाओं को भी महंगा कर देती हैं, जबकि योजनाओं के लिए प्रावधान में कोई बढ़ोतरी नहीं होती. देश के तीव्र विकास के लिए नयी सरकार को कुछ नए तरीके से सोचना अवाश्यक होगा.



Kanhaiya Jha

(Research Scholar)

Makhanlal Chaturvedi National University of Communication and Journalism,

Bhopal, Madhya Pradesh

+919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal)

Email : kanhaiya@journalist.com

Facebook : https://www.facebook.com/kanhaiya.jha.5076
 

भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता

भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता
आज़ादी के बाद देश को 15 वर्ष से भी कम समय में विकसित करने के लिए सिंचाई एवं बिजली उत्पादन के लिए बड़े बाँध, नहरें, निजी एवं सरकारी औद्योगिक क्षेत्र, आदि अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया. इसके लिए किसानों की जमीन को सरकार ने सस्ते दामों पर ले लिया. इससे असंख्य देशवासियों को अपनी कृषि भूमि एवं जंगल छोड़ मजदूरी के लिए अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा. सन 1985 में अमिया राव द्वारा लिखी गयी भारत देश के विकास की यह कहानी  कुछ सोचने पर अवश्य मजबूर करेगी.

उपरोक्त योजनाओं के कारण विस्थापन का सबसे बुरा असर घर की गृहणी पर पड़ा. प्रायः घर के अन्दर ही काम करने की अभ्यस्त औरतों को मजदूरी के लिए जब दूर-दराज़ क्षेत्रों में जाना पड़ा. इसके कारण वर्षों से चली आ रही परिवार परंपरा टूटती गयी. ऐसे में पुरुष को रोजी रोटी की व्यवस्था के लिए अपनी पत्नी-बच्चों का साथ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है. बिना किसी धरोहर, जमीन-जायदाद के अकेले मजदूरी कर बच्चों को पालना किसी भी तपस्या से कम नहीं था. भूख से पीड़ित अनेकों औरतें बड़े शहरों के वेश्यालयों में हमेशा के लिए दफ़न हो गयीं थीं. सन 1985 में अनियोजित क्षेत्र में मजदूरी करने वाली ऐसी औरतों की संख्या 7.5 करोड़ से ज्यादा थी.  
आजादी के 67 वर्ष पश्चात सन 2014 में भी देश के हरेक राज्य में कमोवेशी विकास की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. हर्ष मंदर, गौतम नवलखा आदि लेखकों ने प्रजा के निम्नतम वर्ग की पीड़ा पर भावनापूर्ण लेख लिखे हैं.

प्रश्न उठता है कि क्या आज़ादी के बाद देश के शासकों ने विकास का सही प्रतिमान चुना था ? क्या वह प्रतिमान भारतीय लोकतंत्र की परिभाषा के अनुरूप था?, जिसके अनुसार राजा अथवा शासक वर्ग ईश्वर रूपी प्रजा का सेवक है, अथवा वह अंग्रेजों का ही शासन तंत्र था, जिसे देश ने कुछ फेर-बदल कर अपना लिया था ? प्रमाण इसी ओर इंगित करते हैं कि हमारे शासकों ने पर-तंत्र अथवा दूसरों के तंत्र को चुना था तथा स्व-तंत्र अथवा भारतीय तंत्र को अपनाने का साहस नहीं किया था.  
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एवं आज़ादी के बाद भी जनता में एक नया, सुन्दर देश बनाने का जज्बा था, जिसके लिए उन्हें किसी भी त्याग के लिए तत्पर किया जा सकता था. परंतू पिछले 67 वर्षों में शासन में आये अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों का त्याग का वह जज्बा प्रोत्साहन न मिलने के कारण धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया.

राजनितिक दल चुनाव के मैदान में अपनी पार्टियों को विजयी बनाने के लिए कार्य कर रही है. पिछले कुछ महीनों से देश में एक युद्ध की स्थिति बनी हुई है. चुन के आने वाले लगभग सभी सांसद एक विजेता की भाँती संसद में प्रवेश करेंगे और फिर जनता को भूल हमेशा की भाँती अपने वर्चस्व के लिए जोड़-तोड़ में लिप्त हो जायेंगे.

भारत की राजनीती की दिशा को समझने के लिए चाणक्य के विचार बहुत उपयोगी रहे हैं. चाणक्य सीरिअल शुरू से आखिर तक शिक्षा एवं शिक्षक के मानक ही तय करता है. मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चाणक्य बालक चन्द्रगुप्त को खेलते देख प्रभावित होता है और उसे शिक्षित करने के लिए तक्षशिला गुरुकुल ले जाने का संकल्प करता है (२/८). चन्द्रगुप्त की माँ के यह कहने पर कि उसके बेटे के बारे में निर्णय लेने का अधिकार केवल उसका है, चाणक्य प्रत्युत्तर में कहता है:

"मैं उसका आचार्य हूँ, मैं इसे गर्भ में धारण कर चुका हूँ, तूने एक संभावना को जन्म दिया है, मैं उसे संभव बनाना चाहता हूँ. तू एक माँ है, तुझे अपने पुत्र के बारे में विचार करना है, मैं एक शिक्षक हूँ, मुझे राष्ट्र एवं समाज का ध्यान करना है. मेरा स्वार्थ तेरे स्वार्थ से बड़ा है."

यवनों के भारत में घुसने का मार्ग तक्षशिला से था. जब वहाँ के राजा ने यवनों से संधि कर उनकी सेना को भारत में प्रवेश करने दिया तो गुरुकुल ने निश्चय किया:

      "यदि शासन राष्ट्र के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता तो शिक्षक करेगा."
तक्षशिला के गुरुकुल में छात्रों को शस्त्र विद्या सिखाई जाती थी. राजा के विरोध में छात्रों ने गुरुकुल से निकल जन-जन को जगाने का अभियान छेड़ा. इस पर राजा ने गुरुकुल पहुँच कटाक्ष किया:

राजा: ओह ! तो अब गुरुकुल भी राजनीति से अछूता नहीं रहा.
चाणक्य: जब प्रश्न पूरे राष्ट्र का हो तो गुरुकुल उससे कैसे अछूता रह सकता है. मेरी प्रार्थना है कि आप अलक्षेन्द्र से कोई संधि न करें.
राजा: तक्षशिला मेरी भूमि है, मेरी भूमि पर पर मुझे ही आदेश देने वाले आप कौन हैं ?

राजा को चेतावनी देते हुए चाणक्य ने कहा:

      "जाओ आम्भी कुमार, एक दिन तुम्हें गुरुकुल की सत्ता का परिचय मिल ही जाएगा".
तक्षशिला के गुरुकुल में राजनीति की शिक्षा दी जाती थी. यह शास्त्र की सामर्थ्य थी जो शस्त्र को चुनौती दे रहा था.

उस समय जनपद क्षुद्र स्वार्थों के लिए आपस में लड़ रहे थे. आज देश भर की राजनीतिक पार्टियां राष्ट्र को भूल आपस में एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं. विभिन्न जनपदों को यवन आक्रमण के विरुद्ध एकजुट करने के लिए उनके मुखियाओं को प्रताड़ित करते हुए कहा:

चाणक्य: हिमालय से समुद्र पर्यंत भारत एक है. यदि कोई आपके मस्तक पर आक्रमण करे तो क्या आपके हाथ नहीं उठेंगे, क्या आपके पैर गति करना बंद कर देंगे ?

मुखियाओं ने एकजुट होना तो स्वीकार किया, परंतू किसी को भी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं था.
प्रश्न आज भी नेतृत्व का ही है, जिसके लिए एक दूसरे के प्रति विष-वमन हो रहा है. विडम्बना यह है कि आम चुनाव में यदि जनता ने किसी एक के पक्ष में निर्णय ले भी लिया तो भी यह संघर्ष थमने वाला नहीं है, बल्कि अगले पांच वर्ष यह संसद में जारी रहेगा.

जनपदों के आपसी वैमनस्य से हताश चाणक्य के उदगार:

"समस्त भारत युद्ध की विभीषिका से ग्रस्त है. वह कैसे अलक्षेन्द्र के आक्रमण का उत्तर देगा. कहीं विवाद सीमा का है, तो कहीं विवाद व्यक्तिगत स्वार्थों के संरक्षण का, कहीं जन्म की श्रेष्ठता का तो कहीं धर्म की श्रेष्ठता का. राष्ट्र पतन के कगार पर आ खड़ा है और लोगों को राष्ट्रीयता का कोई बोध नहीं, कोई गर्व नहीं कोई सम्मान नहीं."

स्थिति आज भी कोई ख़ास भिन्न नहीं है. आज भोगवादी विदेशी संस्कृति का आक्रमण है, जिसके कारण सदियों से संजोये भारतीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं. यह राष्ट्र युवा जरूर है, परन्तु नवयुवकों में नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ता जा रहा है. शासन अपने खर्चे को नियंत्रित करने का इच्छुक नहीं है. अप्रत्यक्ष करों के बोझ से पिसी जा रही जनता के कुशलक्षेम की परवाह नहीं. कोई गर्व नहीं, कोई सम्मान नहीं, क्योंकि  भोगवादी आयात के लिए विदेशों से उनकी शर्तों पर क़र्ज़ लेना एक मजबूरी.

यह कैसा लोकतंत्र हमारे शासकों ने स्वीकार किया हुआ है जिसमें शासक वर्ग हमेशा बिना प्रयोजन के संघर्ष में रत है. शिक्षक की अवहेलना की गयी और शिक्षा को धर्म से च्युत कर निरंकुश हो सत्ता का भोग किया जा रहा है.
  
Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University,
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' कार वालों पर मेहरबान सरकार'

अभी हाल में सत्र 2014-15 के लिए पेश किये गए अंतरिम बजट में कारों पर टैक्स कम कर वित्त मंत्री ने 'कार-सेवा' ही की है. यह भी तब जब कि देश के मध्य एवं उच्च वर्ग की सेवा के लिए विश्व के अनेक कार निर्माता स्वयं यहाँ पर कारें बनाने को आतुर हैं. राष्ट्रीय शहरी यातायात नीति (NUTP) भी निजी वाहनों की जगह सार्वजनिक परिवहन के प्रयोग को प्राथमिकता देती है. कारों की खरीद के लिए पैसों की व्यवस्था में भी सरकार ने कुछ योगदान किया. कुछ महीने पहले सरकार ने सातवें वेतन आयोग का गठन कर वास्तव में 'कार सेवा' ही की थी. मध्य वर्ग के लिए कार रखना एक Status Symbol है.     'टेरी' (१) के एक अध्ययन के अनुसार मुख्यतः उच्च-मध्य वर्ग परिवारों में आय बढने के साथ-साथ एक से अधिक कारें रखना सुविधा से अधिक जरूरत बन जाती है.   
     
    पिछले दस वर्षों में दिल्ली सरकार की उपलब्धियों में अनेकों फ्लाई-ओवर्स, पार्किंग स्थल आदि का निर्माण गिनाया जाता है. परंतू नयी कारों के रजिस्ट्रेशन पर कोई नियंत्रण न करने से आज भी सड़कों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति वैसी ही बनी हुई है. जापान जैसे समृद्ध देश में भी नयी कार का रजिस्ट्रेशन तभी किया जाता है जब  कार मालिक पार्किंग सुविधा का प्रमाण देता है. सिंगापुर एवं हाँगकॉंग जैसे समृद्ध शहरी देशों का कुल उत्पाद दिल्ली तथा चेन्नई से कहीं ज्यादा होने पर भी कारों की संख्या कम है. भारत के प्रतिस्पर्धी चीन ने भी अपने अनेक बड़े शहरों में कार रजिस्ट्रेशन का कोटा तय किया हुआ है. दिल्ली और बंगलौर में लगभग तीस हज़ार कारें प्रति-माह रजिस्टर होती हैं जबकि शंघाई शहर में केवल 7 से 8 हज़ार देश के अनेक बड़े शहर बड़ी तेज़ी से दिल्ली एवं बंगलौर की बराबरी पर पहुँच रहे हैं.
    
      देश पेट्रोलियम पदार्थों की अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. यदि कारों की संख्या में इसी तरह की वृद्धि होती रही तो अगले 15 वर्षों में आयात पर यह निर्भरता बढ़ कर 90 प्रतिशत हो जायेगी. खाड़ी देशों की अस्थिरता के चलते देश के लिए यह एक बड़ी समस्या बन सकती है.

     देश में महंगाई का मुख्य कारण देसी एवं विदेशी बजट का घाटा है. विदेशी बजट घाटे में पेट्रोलियम पदार्थों के आयात का, जो कि कुल आयात का लगभग एक तिहाई होता है, मुख्य योगदान रहता है. जिस तेज़ी से निर्यात बढ़ता है उससे कहीं अधिक तेज़ी से आयात बढ़ जाता है. रुपये के अवमूल्यन से भी विदेशी बजट घाटा बढ़ता है. निर्यात बढाने के लिए खनन का सहारा लेना पड़ता है, जिसके वैध और उससे कहीं ज्यादा अवैध खनन से गाँव उजडते हैं, जंगल कटते हैं और साथ ही देश की संपत्ति का भी निर्यात हो जाता है. विकास के लिए खनिज पदार्थ संपदा से कम नहीं होते हैं.

     देसी घाटे का मुख्य कारण भ्रष्टाचार है, जिसमें टैक्स की चोरी, योजनाओं में भ्रष्टाचार आदि अनेक बिन्दु शामिल हैं. इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार देश के सार्वजनिक संस्थानों में अपने शेयर्स बेचती है, जिसे खरीदने में निजी पूंजी के अलावा विदेशी पूंजी भी शामिल रहती है. यह भी एक प्रकार से घाटा पूरा करने के लिए देश की संपदा को बेचना ही है.   

     इस देश की अधिकांश जनता 'बे-कार' अथवा बिना कार वाली है. अनियोजित क्षेत्रों में काम करने वाली यह जनता महंगाई से सबसे अधिक प्रभावित होती है, क्योंकि इसे कोई महंगाई भत्ता नहीं मिलता. काश इस देश की गरीब जनता को इन विषयों की समझ होती अथवा मई 2014 में जनता के नाम पर नए राज्य करने वालों में ईश्वर कुछ भावुकता पैदा करे.   

(१)               'टेरी' The Energy and Resources Institute, TERI


इंडोनेशिया का असफल विकेंद्रीकरण - भारत के लिए सबक

      जनवरी 2014 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने 2009 में पारित एक क़ानून के तहत ताम्बे की कच्ची धातु के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. उनका कहना है कि देश में शुद्ध धातु उद्योग (Smelting) को विकसित करने के लिए कच्ची धातु के निर्यात को बंद करना जरूरी है.  कच्ची धातु के निर्यात यह क़ानून भी उन्हीं की सरकार ने पारित किया था, संभवतः वे इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. राष्ट्रपति द्वारा  की गयी इस घोषणा का इंडोनेशिया में काम कर रही  विदेशी खनन कंपनियों ने तीखी प्रतिक्रया की. खनन से जुडी स्थानीय उद्यमी संगठनों ने भी कोर्ट का दरवाज़ा खट-खटाने की धमकी दे डाली. यह समय इंडोनेशिया के राष्ट्रपति के लिए मुश्किल का समय है क्योंकि विदेशी मुद्रा व्यापार घाटे (Current Account Deficit) की पूर्ती खनन की  कमाई से होती है. खनन उद्योग कुछ ही दशकों में बिखरे तथा छोटे पैमाने के उद्यम से बढ़कर केंद्रीभूत, तथा दानवाकार हो गया है. वहां पर अब बड़ी पूंजी के साथ बहु-राष्ट्रवादी कम्पनियों का वर्चस्व है. अधिकांश में इनका खनन कार्य विकासशील देशों के जंगलों से घिरे आदिवासी क्षेत्र में होता है.
      अनेक टापुओं से बना इंडोनेशिया अपने अपार खनन भण्डार के लिए विश्व प्रसिद्ध है. सन 1938  में जब इंडोनेशिया एक डच कालोनी था उस समय खनन द्वारा कुल निर्यात का 31 प्रतिशत था. जिनमें मुख्य पदार्थ कोयला, तेल तथा निकिल थे. आज़ादी के बाद साठ के दशक से ही बहु-राष्ट्रवादी कम्पनियों ने इंडोनेशिया के खनन उद्योग में पूंजी लगानी शरू कर दी थी. 90 के दशक में भारत की ही तरह इंडोनेशिया पर भी भूमंडलीकरण, नव-उदारवाद आदि का असर आया. देश में विदेशी निवेश की एक प्रकार से बाढ़ सी आ गयी. सरकार ने बैंक, खनन तथा टेलीकोम क्षेत्रों में राष्ट्रीय कंपनियों के शेयर बाज़ार में बेचे. सन 1998 में वहाँ के रुपिये (IDR) का मूल्य रसातल में पहुँच गया.  अपार खनन भण्डार से संपन्न होने के बावजूद इंडोनेशिया बर्बादी की कगार पर आ खड़ा हुआ. लम्बे समय से सत्ता पर काबिज़ राष्ट्रपति सुहार्तो की सरकार का पतन हुआ. आर्थिक मुसीबत से निकलने के लिए विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मदद तो मिली किन्तु पूर्वी तिमोर जो की 1975 से देश का एक प्रांत था, संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की देख-रेख में वहाँ पर सितम्बर 1999 में जनमत संग्रह कराया गया और वह एक अलग राष्ट्र बन गया.
                राष्ट्रपति सुहार्तो के समय में ही वहाँ पर खनन एवं कृषि संबंधी उद्योगों में बड़ी पूंजी अथवा 'कोंग्लोम्रेट्स' (Conglomerates) ने अपना वर्चस्व बना लिया था, जिसमें अधिकाँश भाग विदेशी निवेश का था. इंडोनेशिया की नयी जनतांत्रिक सरकार ने सत्ता में विकेंद्रीकरण का रास्ता अपनाया. प्रान्तों को अपने राज्य के प्रबंधन के लिए अधिक अधिकार दिए गए. 22 बहुराष्ट्रीय खनन कंपनियों के पास सुहार्तो के समय के 'जंगल काट' कारोबार बढाने के लाईसेंस थे. क़ानून 41/1999 पारित कर जब उन्हें कारोबार बढाने के लिए मना किया गया तो अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता (arbitrage) की समस्या पैदा हो गयी.
                देश के एक बहुचर्चित सहकारी मंत्री ने छोटे उद्योगों एवं छोटी पूंजी को बढ़ावा दिया. इन सहकारी संस्थाओं को राज्य का संरक्षण प्राप्त था. इस योजना को उन्होनें 'जनता का अर्थशास्त्र' कहा क्योंकि इन छोटे उद्योगों में स्थानीय इण्डोनेशियाई लोगों की पूंजी लगी थी. बड़ी पूंजी की प्रतिक्रया स्वाभाविक थी. वाशिंगटन पोस्ट ने सहकारी मंत्री को इंडोनेशिया के सबसे खतरनाक व्यक्ति की संज्ञा दी.
                सन 1999 से 2004 के दौरान 4 राष्ट्रपति बदले गए जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही. फिर सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए बनाये गए क़ानून भी ठीक तरह से लागू नहीं हुए. लिहाजा पुराने 'कोंग्लोम्रेट्स' ने पुनः अपना वर्चस्व बना लिया है. इंडोनेशिया में केवल 7 'कोंग्लोम्रेट्स' का 90 लाख हेक्टेयर जंगलों पर अधिकार है. खनन के अलावा पाम आयल तथा लुगदी के लिए खेती भी जंगलों की कटाई के मुख्य कारण हैं. इनपर 'जंगलात सुरक्षा' क़ानून 41/1999 भी लागू नहीं होता जिसके तहत जगलों में केवल छोटे उद्योग ही लगाए जा सकते थे. जून 2013 में जंगलों की आग से इतना अधिक धुआँ उठा कि पास के अन्य देश सिंगापुर तथा मलयेशिया के विरोध पर इंडोनेशिया को हेलिकोप्टर आदि से हस्तक्षेप करना पड़ा.
                इंडोनेशिया का अनुभव भारत की मई 2014४ में आने वाली सरकार के लिए भी उपयोगी होगा. यहाँ भी अनेक राज्यों के जंगलों में वैध तथा अवैध खनन जोरों-शोरों से हो रहा है, जिसमें सीधे अथवा स्थानीय कम्पनियों के माध्यम से विदेशी पूंजी भी लगी हुई है. विदेशी व्यापार तो भारत का भी घाटे का ही है.

      जनता को भी चुनावों से पहले कुछ सोचना चाहिए. साझा सरकारें देश की अपेक्षा पर पूरी तरह से खरी नहीं उतरी हैं.  एक मजबूत केन्द्रीय सरकार ही सफल विकेंद्रीकरण द्वारा 'जनता का शासन' स्थापित कर सकती है. 

Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University,
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