नव-उदारवाद का विकल्प


पिछले दो दशकों के नव-उदारवाद (Neo Liberalism) ने विकासशील देशों को लगभग उपनिवेश ही बना ही दिया है. उपनिवेश पूंजीपतियों के लिए कई महत्वपूर्ण संसाधन जैसे कि सस्ते मजदूर, जमीन, जंगल, आदि उपलब्ध कराते थे. साथ ही पूंजी के लिए निवेश तथा "बहु संख्या उत्पादन" अर्थात mass production के लिए बाज़ार भी उपलब्ध कराते थे. आज पूंजीवाद बड़ा पैसा लगाकर पूरे विश्व के बाज़ार पर अपना वर्चस्व बनाने में लगा है, जिससे की वह मनचाहा लाभ कमा सके.

खाद्यान वस्तुओं के मामले में आज विदेशी बीज कम्पनिओं ने उन्नत बीजों के नाम पर विश्व में  वर्चस्व बनाया हुआ है. Friends of Earth की अप्रैल 2012 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व बैंक युगांडा सरकार को पाम आयल की खेती के लिए पूंजी तथा तकनीकी मदद दे रहा है. यह कार्यक्रम एक घने जंगल वाले द्वीप में चलाया जा रहा है जिसके एक चौथाई क्षेत्र के जंगलों को इसी काम के लिए साफ़ कर दिया गया है. यद्यपि वहां के स्थानीय लोगों को रोज़गार का आश्वासन दिया गया था, परंतू खेती के अत्याधिक मशीनीकरण से आज उन्हें जीवनयापन में भी कठिनाई आ रही है. बाज़ारों के वैश्वीकरण से खाद्य पदार्थों के प्रत्यक्ष व्यापार तथा सट्टाबाजारी से विदेशी कम्पनियां अपनी पूंजी के बल पर पूरे विश्व पर अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं.

सन 1973 में शुमाखर ने अपनी एक थीसिस Small is Beautiful प्रकाशित की. विकसित देशों ने उसको खारिज कर नव-उदारवाद को अपनाया क्योंकि उन्हें केवल अधिक लाभ कमाना था. परंतू गरीबी एवं बेरोज़गारी से जूझ रहे विकासशील देशों के लिए यह एक आशा की किरण साबित हो सकती है. आज उत्पादन में automation अर्थात स्वचालन का अधिक उपयोग हो रहा है, जो एक capital intensive अर्थात पूँजी सघन तकनीक है. हम भारत में labor intensive अर्थात "रोजगार सघन" तकनीक का उपयोग करें जो पुरानी होने से आसानी से उपलब्ध भी है. हम mass production की जगह production by masses कर उतना ही उत्पादन कर सकते हैं. आज विश्व में स्वचालित मशीनों से बनी उच्च गुणवत्ता वाली वस्तुओं की आवश्यकता केवल विकसित देशों में ही है. हम पूंजी के स्थान पर विकसित देशों से स्पर्धा के लिए अपनी युवा जनसंख्या का उपयोग करें, जो पिछले कुछ वर्षों के प्रयास से आज तकनीकी तथा प्रबंधन विषयों में शिक्षित भी है.

शुमाखर बड़ी पूँजी, बड़ी योजनाओं के स्थान पर छोटी पूँजी तथा छोटी योजनाओं के पक्षधर हैं. अभी हाल में प्रकाशित एक लेख में (TOI 9 Nov 2013) सन 2005 से लागू अस्सी हज़ार करोड़ रुपये की एक योजना (JNURM) की समीक्षा की गयी. इस योजना के अंतर्गत देश के 8000 में से केवल 467 छोटे शहरों की बुनियादी सुविधाओं को ठीक करना था. यदि यह मान भी लिया जाए कि खर्च किये पैसे का पूरा सदुपयोग हुआ, तो भी बजट घाटे को नियंत्रित करते हुए इन बड़ी योजनाओं के लिए हर वर्ष जरूरी पैसे की व्यवस्था करना मुश्किल होता है. यह उसी तरह से है जैसे की एक हाथी को खरीदा तो सही परंतू यदि उसके रोजाना के भोजन की व्यवस्था नहीं की तो बड़ी पूंजी भी गड्ढे में गयी.

पिछले दो दशकों में देश का विकास भी बेतरतीब हुआ है. देश की आधी से ज्यादा जनता जो गाँवों में रहती है उसका जीडीपी में योगदान केवल 15 प्रतिशत है. भयंकर बेरोजगारी तथा शहरों की और migration रोकने के लिए बहुत जरूरी कि गाँवों में ही कृषि आधारित व्यवसाय लगाए जाएँ. इन उत्पादों की खपत के लिए ग्रामीण क्षेत्र की "खरीद शक्ति" भी बढानी होगी. पिछले कई वर्षों से चल रही मनरेगा जैसी बड़ी योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्र की खरीद शक्ति तो जरूर बढ़ाई, परंतू यदि साथ ही उद्योग भी स्थापित किये जाते तो अवश्य ही बेहतर नतीजे आते.

शुमाखर ने एक नए अर्थशास्त्र का विचार दिया जिसे उन्होंने "बुद्ध का अर्थशास्त्र" कहा. पारंपरिक अर्थशास्त्र लाभ की गणना में पर्यावरण के नुक्सान अथवा मूल्य को नज़रअंदाज़ करता है. बढती हुई आबादी तथा सीमित क्षेत्रफल के कारण भारत कटते हुए जंगल, विदूषित पानी एवं जमीन आदि को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता.

एडम स्मिथ की किताब Wealth of Nations में पिन बनाने वाली एक ऐसी फैक्ट्री की कल्पना दी है जिसमें बहु-संख्यक उत्पादन के लिए कारीगर के लिए कुछ खास करने का नहीं होता. शुमाखर के अनुसार कारीगरों से इस तरह के निरर्थक तथा उबाऊ काम कराना अपराधिक होता है. फिर यदि कोई व्यक्ति रोजाना ऐसे उबाऊ काम करता रहे तो निराशा से उसमें भी अपराधिक प्रवृत्तियों का जन्म हो सकता है. बेरोज़गारी से परेशान किसी व्यक्ति को यदि घर बैठे पैसे मिलने लग जाएँ तो भो वो अपने अहम् की संतुष्टि के लिए काम करना चाहेगा, जहां उसकी अपेक्षा काम के एक स्वस्थ वातावरण की होगी.


पूंजीवाद के मुकाबले शुमाखर की Small is Beautiful कल्पना में जीडीपी बेशक कम हो परंतू जीएचपी अर्थात Gross Happiness Product कहीं ज्यादा है. साथ ही उस खुशी के "उत्पादन" तथा भोग दोनों में ही जड़ एवं चेतन सभी की सहभागिता है. इस कल्पना को साकार करने में शिक्षा के नए आयामों का विस्तार से वर्णन किया है. पूंजीवाद के विपरीत शुमाखर की विकास योजना में जनता सहर्ष सहयोग करे, इसमें मीडिया का भी एक महत्वपूर्ण दायित्व बन जाता है.

Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University, Bhopal, Madhya Pradesh
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