महंगाई कम करने के लिए सरकार को अपना खर्च कम करना ही पड़ेगा

यदि महंगाई कम करनी है तो सरकार को अपना खर्च कम करना होगा. सन 2010 से सरकार पेट्रोलियम एवं रासायनिक खाद पदार्थों पर से अपना नियंत्रण हटाती जा रही है और मुख्यतः निजी क्षेत्र की कम्पनियां को इन पदार्थों के दाम तय करने का काम सौंपती जा रही है. खाद्य पदार्थों के लिए भी सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System, PDS) का विकल्प बनाने का प्रयास कर रही है. उपरोक्त तीनों वस्तुओं पर सरकार द्वारा दी गयी अनुदान राशि बढती जा रही है  जिससे सरकार का बजट घाटा बढ़ रहा है. सरकार के अपने खर्चों पर भी अंकुश न लगा पाने के कारण भी बजट घाटा बढ़ रहा है. आयात को नियंत्रित ना कर पाने से विदेशी बाज़ार से क़र्ज़ लेना सरकार की एक मजबूरी हो गयी है. अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियाँ सरकार पर बजट घाटा कम करने के लिए लगातार दबाव बनाए हुए है. उनके अनुसार यदि सरकार अधिक खर्च करना चाहती है तो नए नोट न छाप कर विदेशी बाज़ार से क़र्ज़ उठाये. इस दुश्चक्र से बाहर निकलने का सरकार के पास एक ही रास्ता है कि वह अपना खर्च कम करे  अन्यथा महंगाई को रोकना असंभव होगा.

पेट्रोलियम पर अनुदान
पेट्रोलियम पदार्थों की शुद्धिकरण एवं विक्रय में लगी निजी एवं पब्लिक क्षेत्र की कंपनियों ने सत्र 2008-09 में मिलकर 27 हज़ार करोड़ रुपये का लाभ कमाया था. इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण सरकार की इस क्षेत्र से अपनी कमाई थी जिसे उसने इन कंपनियों पर टैक्स लगाकर अर्जित किया. सत्र 2009-10 में केंद्र एवं राज्य सरकारों ने मिलकर 1 लाख 83 हज़ार करोड़ रुपये केवल टैक्स द्वारा कमाए. इसके अलावा पूर्व में केंद्र सरकार ने ONGC  में अपने 26 प्रतिशत शेयर बेच कर कमाई की थी. सरकार का इसी मद में कुछ और शेयर बेच कर कमाई करने का प्रस्ताव भी था. एक अनुमान था कि सत्र 2010-11 में तेल बेचने वाली निजी एवं सार्वजानिक कम्पनियां 73 हज़ार रूपए का नुक्सान उठाएंगी. वास्तव में यह नुक्सान का अनुमान नहीं था बल्कि आयतित तेल तथा देसी तेल के दामों के अंतर के कारण था, जिसको कम्पनियां  'कम प्राप्ति' अथवा Under recovery कह कर छोड़ देते रहे हैं.

सरकार का यह तर्क कि पेट्रोलियम पदार्थों पर अधिक टैक्स लगाने से उसकी खपत में कमी आएगी, सही नहीं है. समाज का वह वर्ग जो सफ़र के लिए कारों का उपयोग करता है उस पर पेट्रोलियम पदार्थों के दामों के बढ़ने का कोई ख़ास असर नहीं होता. परंतू आम जनता के लिए पेट्रोलियम के दाम बढ़ने से सामान्य उपभोग की सभी वस्तुएं महंगी हो जाती हैं.    

रासायनिक खादों पर अनुदान 
अप्रैल 2010 से सरकार ने नयी खाद नीति लागू कर दी थी, जिसके अनुसार सरकारी अनुदान खाद में उपलब्ध पौष्टिक तत्वों (Nutrient Based Subsidy, NBS) पर आधारित कर दिया गया था. साथ ही खाद कम्पनिओं को उनके उत्पादों के बाज़ार भाव तय करने के लिए मुक्त कर दिया. इससे पहले प्रत्येक उत्पाद पर एक निश्चित अनुदान था (Product Based Subsidy, PBS)  और किसानों के लिए खाद के मूल्य सरकार द्वारा निश्चित किये जाते थे.

यदि यह मान भी लें कि खाद कम्पनियां अधिक लाभ कमाने के लिए अनुचित तरीके नहीं अपनाएंगी, तो भी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में खाद के मूल्यों का देसी बाज़ार पर असर आयेगा. यह इसलिए क्योंकि भारत बड़ी मात्रा में खादों का आयात करता है. पोटाश खाद के आयात में तो भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बड़े सटोरियों के कारण खाद के मूल्यों में जबरदस्त उतार चढ़ाव होते रहते हैं. विश्व बैंक के अनुसार 2002 से 2008 के बीच अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में खाद के दाम 5 गुने हो गए.

खाद्य पदार्थों के लिए अनुदान
इन पदार्थों के लिए भी सरकार की सोच बाज़ार भावों को अपने नियंत्रण से मुक्त करने की है. इसके लिए सरकार ने 'आधार कार्ड' योजना को कार्यान्वित किया. अनुदान की राशि बीपीएल (Below Poverty Line) कार्ड धारकों को सीधे ही देने की योजना है. इसके लिए वे अपने आधार कार्ड का प्रयोग कर अनुदान राशि के बराबर एक कूपन प्राप्त करेंगे, और फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के किसी भी गोदाम से अपना राशन ले सकेंगे. परंतू आधार कार्ड की सूचना से बीपीएल परिवारों की पहचान करने में एक बड़ी दफ्तरशाही तैनात करनी होगी.

इसी योजना के तहत सरकार इस वर्ष 'खाद्य सुरक्षा बिल'  लेकर आयी है. यह एक कानूनी अधिकार है जिसे सरकार देश की कम से कम 75 प्रतिशत जनता को देना चाहती है. एक अनुमान के अनुसार इस योजना के लिए लगभग 58 मिलियन टन अनाज की आवाश्यकता होगी. पिछले दशक में देश में कम से कम 140 मिलियन टन अनाज का उत्पादन हुआ है, तथा सरकार द्वारा कम से कम 21 प्रतिशत अनाज की खरीद हुई. इस दशा में सरकार को बाज़ार से अथवा आयात कर 30 मिलियन टन अनाज की व्यवस्था करनी होगी. दोनों ही स्थितिओं में अनाज के बाज़ार भावों में जबरदस्त उछाल आने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसे में सरकारी कूपन कितने मान्य होंगे,  इसका अनुमान लगाया जा सकता है. हार कर उपभोक्ता को बाज़ार मूल्य पर अनाज खरीदना पड़ेगा. सामान्य अवस्था में भी सरकार इस योजना के लिए लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का अनुदान वहन करेगी.
निष्कर्ष   

जिस देश में आधी से अधिक जनता गरीब हो सरकार महंगाई पर नियंत्रण करने की अपनी जिम्मेवारी से मुक्त नहीं हो सकती. इसलिए उपरोक्त वस्तुओं के दामों को सरकार पूर्णतया बाज़ार के सहारे नहीं छोड़ सकती. बाज़ार ऐसा सीधा नहीं कि बिना अंकुश के अपने लाभ के लालच को छोड़ सके. सरकार यदि अनुदान घटाएगी या टैक्स बढ़ाएगी तो महंगाई बढ़ेगी. इसलिए सरकार के पास अपना खर्च घटाने के सिवाय और कोई चारा नहीं. 

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