भारत की वास्तविक शक्ति

यूपीए-2 के एक मंत्री ने भारत की शक्ति के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा, "यदि आज भारत को एक सुपर पावर समझा जाता है तो वह उसके बढते हुए व्यापार अथवा जनतंत्र के कारण नहीं है. भारत अपनी सभ्यता को अपने खान-पान, संगीत, टेक्नोलोजी तथा बोलीवुड के माध्यम से विश्व के लोगों से शेयर करता है."

मंत्री जी शायद भारत की नहीं बल्कि भोगवादी सभ्यता की बात कर रहे थे. आज शादियों तथा पार्टियों का शाही खान-पान, बोलीवुड का संगीत एवं उनकी फिल्मों के कथानक का भारतीयता से कोई लेना-देना नहीं है. अधिकाँश बोलीवुड फिल्मों में स्त्रियों का उन्मुक्त, भोग्या-रूप चित्रण भारतीय सभ्यता के बिलकुल विपरीत है. भारत की शक्ति उसकी प्राचीन काल से चली आ रही भारतीयता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति बिना ज्ञान अर्जित किये हुए शूद्र ही रहता है. बिना ज्ञान के धर्महीन होकर वह अनाधिकार अर्थ अथवा अनर्थ अर्जित करता है, काम की जगह कामवासना में लिप्त रहता है, और चार्वाक के सिद्धांतों का पालन कर केवल स्वयं के भोगों से लगाव रख परिवार, दीन-दुनिया की परवाह न करते हुए हमेशा मुक्त ही रहता है.

भारतीयता को पूरी तरह जानने के लिए उसकी वर्णाश्रम व्यवस्था को पूरी तरह समझना जरूरी है. वर्णाश्रम धर्म को जातिवाद या Caste System मानकर उसका अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए दुरूपयोग पहले विदेशी अंग्रेजों ने, और बाद में काले अंग्रेजों ने वोट-बैंक पोलिटिक्स के लिए किया. वेदों की ही भांति वर्णाश्रम व्यवस्था का ज्ञान ईश्वरीय अथवा आकाशीय है, और भारत की प्राचीनतम विद्या ज्योतिष में निहित है. यह केवल किसी अनजान ऋषि को प्राप्त ईश्वरीय प्रेरणा ही हो सकती है जिसने सर्वप्रथम आकाशीय नक्षत्रों एवं ग्रहों की गति को पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों की जीवनचर्या से जोड़ा. अब तो पश्चिम में भी, जो कि केवल तार्किक एवं प्रायोगिक ज्ञान को ही विज्ञान की संज्ञा देता है,  एस्ट्रोलौजी का खूब प्रचार-प्रसार हो रहा है. पश्चिमी एस्ट्रोलौजी भारतीय ज्योतिष का ही एक सरल रूप है.

किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में १२ घर होते हैं जो चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष में बराबर-बराबर विभाजित होते हैं.

धर्म के पुरुषार्थ के लिए घर संख्या 1,5,9 का त्रिकोण है. उसी प्रकार अन्य त्रिकोण - अर्थ के लिए 10,2,6; काम के लिए 7,3,11 तथा मोक्ष के लिए 4,8,12 हैं. धर्म त्रिकोण का मुख्य घर संख्या 1 है जो कि वो स्वयं अर्थात उसका व्यक्तित्व है. इसे लग्न भी कहते हैं. अर्थ त्रिकोण का मुख्य घर संख्या 10 है जो उसके कर्म हैं. घर संख्या 7 काम त्रिकोण का मुख्य है. पुरुष के लिए यह उसकी पत्नी का घर होता है. स्त्री यदि भोग्या है तो केवल उस पुरुष की जिसका वो परमेश्वर रूप मान कर स्वयं अपनी इच्छा से वरण करती है. मोक्ष त्रिकोण का मुख्य घर संख्या 4 है, जो व्यक्ति को घर से प्राप्त सुख-सुविधाओं को भी दर्शाता है. श्रीकृष्ण सब सुविधाओं के होते हुए मुक्त रहकर मोक्ष रूप को चरितार्थ करते हैं.

'यत पिंडे तत ब्रह्माण्डे' के महत्वपूर्ण सिद्धांत के अनुसार जो पुरुषार्थ पिंड अथवा व्यक्ति के लिए हैं वही  देश तथा विश्व के लिए भी हैं. प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार देश तथा विश्व के पुरुषार्थों में योग कर पाए यही वर्णाश्रम धर्म का उद्देश्य है. इस सामाजिक व्यवस्था में चार आश्रम, चार वर्ण तथा चार पुरुषार्थ निम्न प्रकार से जुड़े हुए हैं:-
               आश्रम              वर्ण       पुरुषार्थ
               ब्रहमचर्य                शूद्र       धर्म
               गृहस्थ                   वैश्य      अर्थ
               वानप्रस्थ               क्षत्रिय     काम
               संन्यास                ब्राह्मण    मोक्ष

जन्म के समय हर मनुष्य शूद्र है क्योंकि वह अभी अज्ञानी है. ब्रहमचर्य में प्रथम पच्चीस वर्ष धर्म पुरुषार्थ को भली भाँती समझ वह धनोपार्जन तथा परिवार बनाने के लिए गृहस्थ में प्रवेश करे. अगले 25 वर्ष में इतना धन कमाए एवं बचाए जिससे कि बाकी के जीवन में कमाई के लिए अधिक प्रयास न करते हुए भी निर्वाह हो सके. पचास वर्ष की आयु के बाद का समय देश, समाज एवं विश्व के लिए कुछ करने के लिए हो. देश ने शिक्षा व्यवस्था के द्वारा ज्ञान दिया, समाज ने परिवार का सुख दिया. इसलिए अपने पूर्व अनुभव का लाभ देश एवं समाज को मिले, जिससे कि आगे आने वाली पीढ़ी बेहतर पृथ्वी की हकदार बने. सन्यास में तो और भी अधिक अनुभव हो गया, जो कि वास्तव में देश, समाज एवं विश्व की पूजी है. सरकार इस पूंजी का उपयोग नयी पीढ़ी की शिक्षा के लिए कर सकती है, और इसके बदले वह उनके भरण-पोषण की व्यवस्था करे. देश एवं विश्व के भोगों पर नियंत्रण के लिए यह एक अद्वितीय सामाजिक व्यवस्था है. यदि ब्रह्मचर्य एवं गृहस्थ भोग में हैं तो वानप्रस्थ एवं संन्यास भोग छोड़ रहे हैं.

पिछले दो दशकों से चल रही नव-उदारवाद पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था में व्यक्ति एवं देश एक बाज़ार है. यह तो पूरी तरह से 'अर्थ' भी नहीं है, क्योंकि इसमें शोषण का भी अंश है. सही विकास की राजनीतिक व्यवस्था में चारों पुरुषार्थ पोषित हों.

लेख के दूसरे भाग में चारों पुरुषार्थों को पोषित करती हुई राजनीतिक व्यवस्था की चर्चा की जायेगी. साथ ही भारतीय संस्कृति के अन्य पहलुओं जैसे नदियों एवं जंगलों का संरक्षण, पूजा पद्वति आदि पर भी विचार-विमर्श होगा.     

भारत की शक्ति के रूप में वर्णाश्रम व्यवस्था के द्वारा देश के सम्पूर्ण विकास को चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के आधार पर नियोजित किया जा सकता है. यह विकास जनता स्वयं अपने बल पर करेगी. बच्चों एवं युवाओं को शिक्षित करते हुए धर्म की नींव को सुद्रढ़ किया जाएगा. अर्थ अर्जित करते हुए सब प्राणियों के पृथ्वी पर रहने के अधिकार को सुरक्षित रखा जाएगा. यह देश नदियों, पर्वतों, जंगलों आदि को भी जीवित मानता था. जब प्रत्येक परिवार से न्याय की कामना बलवती होगी तो भ्रष्टाचार का समाज में कोई स्थान नहीं रहेगा. सांसारिक भोगों से निवृत्त, अर्थ एवं काम के व्यवहारिक ज्ञान से समृद्ध सन्यासी बच्चों एवं युवाओं को धर्म की सही शिक्षा देंगे. सर्वांगीण विकास के इस प्रतिमान (model) में राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य काम देश एवं व्यक्ति को सुरक्षा देना होगा.

इसी सन्दर्भ में भारत की प्राचीन पूजा पद्धत्ति की चर्चा भी जरूरी है जिसका उदेश्य जनता को विकास के लिए शक्ति प्रदान करना था. भारतीय शास्त्रों में जनता को जनार्दन अथवा विष्णु कहा गया है. भगवान्, ईश्वर, परमात्मा के लिए जो भी विशेषण प्रयोग में आते हैं, वे सब जनता के लिए भी प्रयोग किये जा सकते हैं. परमात्मा अनंत है तो पृथ्वी पर जनता का विस्तार भी अनंत है. परमात्मा का न आदि है न अंत है, तो जनता भी अनादि काल से इस पृथ्वी पर विराजमान है और अनंत काल तक इस पृथ्वी पर रह सकती है, यदि भोगों में पड़कर शक्तिहीन न हो जाए. इस प्रकार परमात्मा की पूजा वास्तव में जनता की ही पूजा है. 

भागवत पुराण में अनेक जगह परमात्मा के विराट रूप की चर्चा है. भगवान् के इस विराट रूप में सभी देवी, देवताओं, ग्रहों, नक्षत्रों के साथ-साथ दैत्यों एवं असुरों का भी समावेश है. मंदिरों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित कर उनकी पूजा करने का अर्थ जनता में उन्हीं-उन्हीं शक्तियों के विकास की आकांक्षा करना है. देवताओं तथा दैत्यों द्वारा किया गया समुद्र-मंथन वास्तव में विकास की प्रक्रिया थी जिसमें भगवान् विराट अथवा जनता ने कच्छप बन आधार प्रदान किया, और फिर अपनी ही शिव-शक्ति से उत्पादित विष को भी पिया. श्रीराम एवं श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखा कर यही प्रदर्शित किया कि उनका उद्गम भी इसी अनंत जनता से है.

विराट से ही जुड़े हुए अनेक शब्द जैसे राष्ट्र, सम्राट, एकराट (मनुष्य) जनता से ही सम्बंधित हैं. 

सदियों पुरानी भारत की शक्ति के इन मूलभूत विचारों में तथा उनके क्रियान्वन में अनेकों विकार एवं बाधाएं आयीं. परंतू फिर भी जमीनी स्तर पर जनता की शक्ति की परिचायक पंचायती व्यवस्था स्थापित हुई. ये स्वायत्त ग्राम इकाईयाँ पूरे देश का शासन चलाती थीं. सन 1930 में इनके बारे में सर चार्ल्स मेटकाफ ने लिखा था, "हिन्दु, मराठा, मुग़ल, अँगरेज़ आदि अनेक शासन आये परंतू इन स्वायात इकाईओं में कोई बदलाव नहीं आया. मुश्किल के समय ये अपने को हथियारबंद कर अपनी सुरक्षा के लिए तैयार हो जाते हैं, और शत्रु सेना को शान्ति से रास्ता दे देते हैं. यदि शत्रु सेना लूट-पाट करती है तो पास के गाँवों में चले जाते हैं और अंधड़ गुजर जाने पर वापिस फिर वैसे ही रहने लगते हैं." 

भारत द्वारा पश्चिमी देशों की नक़ल कर अपनाये गए भोगवादी विकास में सर्वत्र फ़ैली भ्रष्ट राजनीति, मृतप्राय नदियाँ, जहरीली हवा में सांस लेते हुए शहर, विशालकाय योजनाओं द्वारा उजाड़े गए परिवार, भुखमरी आदि की कीचड़ के बीच कहीं-कहीं सोने की लंकायें भी खड़ी हैं.

भारत में अधिकाँश बे-कार अथवा बिना कार वाली जनता है जो आलसी नहीं है, जो मेहनत करना जानती है, जो भोली है इसलिए अभी तक अपने ही देश में बचे-खुचे काले अंग्रेजों की चालबाजियां नहीं समझ पायी है. राजा राम ने इस बे-कार सी जनता की शक्ति से ही रावण के कलुषित राज्य का अंत किया. पिछली सदी में उन्हीं श्रीराम से प्रेरणा ले महात्मा गांधी ने इसी जनता का समर्थन ले इस देश से सफ़ेद अंग्रेजों को भगाया. मई 2014 में होने वाले चुनावों में राष्ट्र को ऐसे ही नेतृत्व की अपेक्षा है जो भारतीयता के आधार पर देश का विकास करे. यदि इस देश में राम-मंदिर बने तो वह भारतीयता से सशक्त जनता की 'कर सेवा' से बने.

Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National University of Communication and Journalism,
Bhopal, Madhya Pradesh
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