क्या खतरे में है भारत की सार्वभौमिकता ?

कुछ दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने कहा कि  उन्हें विदेशी पूंजी निवेश (ऍफ़ डी आई) से कोई परहेज नहीं है. साथ ही उन्होनें यह भी कहा कि यदि कोई वस्तु देश में बन सकती है तो उसे आयात करने की कोई आवश्यकता नहीं. विदेशी व्यापार अपनी शर्तों पर होना चाहिए. कोई बहुराष्ट्रीय निगम (MNC) अपनी शर्तें सरकार पर नहीं थोप सकती. इसके विपरीत देश के वित्तमंत्री श्री चिदंबरम तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री आह्लूवालिया अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट ऐजेंसीस को मनाने में लगे हैं कि वे भारत की कर्ज लेने की साख को कम ना करें. सिंगापुर में प्रवासी भारतीयों को सम्बोधित करते हुए श्री चिदंबरम ने उन्हें भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया है.

वास्तव में क़र्ज़ लेना भारत की मजबूरी बन चुका है. आज़ादी के बाद से ही देश का विदेशी व्यापार घाटे का रहा है. सत्तर के दशक तक यह घाटा अंतर्राष्ट्रीय सहायता से पूरा होता था, जिसके पीछे कुछ शर्तें तो अवश्य होती थीं. जैसे की साठ के दशक में रूपए का 30 प्रतिशत से अवमूल्यन करना पड़ा. इसके पीछे सन 62 के चीन युद्ध के बाद भारी मात्रा में रक्षा सामग्री का आयात था. सत्तर के दशक से 'हरित क्रान्ति' के तहत देश की खेती आयतित रासायनिक खाद पर निर्भर हो गयी. अब अंतर्राष्ट्रीय सहायता मिलनी बंद हो गयी थी. इसलिए अस्सी के दशक में घाटे की पूर्ती के लिए वैश्विक संस्थाओं विश्व बैंक तथा आई एम् ऍफ़ (IMF)  से ऋण लिया जाता रहा, जिसके लिए उन्होनें देश के निर्यात पर अनेक प्रतिबन्ध भी लगाए.

देश में मुख्यतः सम्भ्रान्त वर्ग हमेशा से ही विदेशी उपभोग के सामान के प्रति आकर्षित रहा है. अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में आयात में ढील देने से व्यापार घाटा इतना बढ़ा कि देश का विदेशी मुद्रा भण्डार केवल दो हफ्ते के आयात के लिए काफी रह गया था. सन 1991 में इस संकट से उबरने के लिए सरकार को अपना सोना गिरवीं रखना पड़ा. साथ ही आई एम् ऍफ़ से ऋण तो मिला परंतू देश के बाज़ार को विदेशी सामान के आयात के लिए मुक्त करना पड़ा. उद्देश्य यह था कि आयात को मुक्त करने से निर्यात तेज़ी से बढेगा और व्यापार घाटा कम होगा. कुछ वर्षों तक तो ऐसा हुआ परंतू नब्बे के दशक के उत्तरार्ध से व्यापार घाटा फिर तेज़ी से बढ़ने लगा. वैश्विक संस्थाओं से ऋण कम दरों पर मिलता था. परंतू अब व्यापार घाटा बाज़ार दर पर उधार लेकर ही पूरा किया जा सकता था. साथ ही विदेशी ऋण की सुरक्षा के लिए आई एम् ऍफ़ ने 'रचनात्मक बदलाव' अर्थात Structural Adjustment Program (SAP) के तहत सरकार को बजट घाटे को नियंत्रित करने का भी निर्देश दिया.

भुगतान के संतुलन (Balance of Payment, BOP) के बिगड़ने का मुख्य भाग व्यापार घाटा (Trade deficit) होता है. यह द्रश्य अथवा भौतिक माल के व्यापार (Merchandise trade) के आयात निर्यात का अंतर होता है. देश की मुख्य समस्या आयात रही हैजिसका कुल उत्पाद के साथ अनुपात जो सन 1992 के  'रचनात्मक बदलाव' से पहले 10 प्रतिशत से कम रहता था बढ़ते-बढ़ते 2013-13 में 25 प्रतिशत तक पहुँच गया. परंतू निर्यात की तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद पूरी नहीं हुई. इसलिए व्यापार घाटा कुल उत्पाद के अनुपात में, जो सन 92 से पहले 2 प्रतिशत से कम रहता था, बढते-बढ़ते 2012-13 में 10 प्रतिशत तक पहुँच गया. इसका असर देश के विदेशी मुद्रा भण्डार पर भी पड़ा जो इस वर्ष केवल 7 से 8 महीने के आयात के लिए पर्याप्त था.

विदेशी उपभोग की वस्तुओं के साथ-साथ देश के सम्भ्रान्त वर्ग का सोने के प्रति भी उतना ही आकर्षण है. पिछले कुछ वर्षों में सोने का आयात तेज़ी से बढ़ा जिसका देश के लिए कोई लाभ नहीं है. सन 2013-13 में यह देश के कुल आयात का 11 प्रतिशत था. यदि सरकार इस पर नियंत्रण लाती तो व्यापार  घाटा भी कम होता.

व्यापार घाटे को सरकार अद्रश्य प्राप्ति अर्थात Invisibles से करती है. नब्भे के दशक में खाड़ी के देशों में काम करने वाले मजदूरों से विदेशी मुद्रा की प्राप्ति इसी मद में गयी. साथ ही इसी दौरान आई टी सुविधाओं से भी देश ने काफी विदेशी मुद्रा कमाई. इन दोनों को जोड़ने से चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit, CAD) प्राप्त होता है.  यदि सन 2000-04 तक के समय को छोड़ें तो चालू खाता हमेशा से घाटे में रहा है. अद्रश्य प्राप्ति जो सन 2000-01 में कुल उत्पाद के २४ प्रतिशत तक पहुँच गयी थी हाल के वर्षों में घटते-घटते केवल ६ प्रतिशत रह गयी है. इसी कारण चालू खाते का घाटा बढते-बढते सन 2012-13 में 74 बिलियन डालर हो गया जो देश के कुल उत्पाद का 4.8 प्रतिशत है.

चालू खाते के घाटे की भरपाई या तो विदेशी मुद्रा भंडार से की जाती है या फिर बाज़ार से उधार ले कर करनी होती है. यह सरकार का पूंजी खाता (Capital Account) कहलाता है. मार्च 2013 में देश के पास 292 बिलियन डालर का विदेशी भंडार था जो की लगभग 8 महीने के आयात के लिए पर्याप्त था. इसके अलावा भारत ने अन्य देशों में भी अपनी पूंजी लगाई हुई है. इन दोनों को मिलाकर दिसंबर 2013 तक के 724 बिलियन डालर के कुल क़र्ज़ का भुगतान किया जा सकता है. यद्यपि अन्य देशों में किये गए पूंजी निवेश को तुरंत नहीं निकाला जा सकता.

पूंजी खाते से यदि प्राप्ति हो तो व्यापार घाटा कम हो सकता है. परंतू इस खाते का घाटा भी तेज़ी से बढ़ रहा है. जिन देशों में भारत ने निवेश किया है उनके यहाँ ब्याज दर लगातार कम हो रही है, जबकि जरूरत एवं मुसीबत में लिए गए क़र्ज़ पर ज्यादा ब्याज देना पड़ता है. पूंजी खाते के लाभ अथवा हानि को चालू खाते के घाटे में जोड़ने से कुल भुगतान के संतुलन का हाल मालूम पड़ता है, जिसमें से छोटी  के क़र्ज़ की अदायगी को नियोजित करना ज्यादा जरूरी है.

देश के कुल क़र्ज़ 724 बिलियन डालर में 160 बिलियन डालर छोटी अवधि का क़र्ज़ है जिसे किसी समय भी वापिस करना पड़ सकता है. फिर विदेशी संस्थानों (FII) द्वारा देश के शेयर बाज़ार में अब तक किया गया निवेश जो सितम्बर 2012  में 129 बिलियन डालर था किसी समय भी देश से बाहर जा सकता है. और जब यह बाज़ार से बाहर जाएगा तो इसका भुगतान उस समय के बाज़ार मूल्य पर करना होगा, जो मार्च 2013 में 239 बिलियन डालर था. इसके अलावा 55 बिलियन डालर प्रवासी भारतीयों का है. जहाँ तक देश की सम्पत्ति तथा संस्थानों में प्रत्यक्ष निवेश (FDI) का सवाल है यह भी बहुत स्थायी नहीं है, क्योंकि निजी क्षेत्र द्वारा किये गए इस निवेश का उद्देश्य छोटी अवधि में लाभ लेना होता है.

जब भी निवेशित विदेशी पूंजी देश से बाहर जाती है तो रुपये का भी अवमूल्यन होता है, जैसा कि अभी कुछ महीने पहले हुआ. इससे विदेशी मुद्रा में देश के आयात का मूल्य और कम होता है. इसलिए श्री चिदंबरम एवं वित्त मंत्रालय अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट ऐजेंसीस की शतें मानने के लिए मजबूर हैं, जिनका निर्देश है कि देश का बजट घाटा कुल उत्पाद के 3 प्रतिशत से ज्यादा न हो. यदि सरकार विकास या अन्य किसी काम के लिए अधिक खर्च करना चाहती है तो वह विदेशी बाज़ार से क़र्ज़ ले, जो की अब उसके लिए एक मजबूरी हो चुकी है.


Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University, Bhopal, Madhya Pradesh
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