अगला प्रधानमंत्री कैसा हो?

मई 2014 में देश के नए प्रधानमंत्री संविधान के अनुसार काम करने की शपथ लेंगे. आज देश की जनता के सामने महंगाई तथा भ्रष्टाचार दो मुख्य मुद्दे हैं. लगभग 15 करोड़ नए युवा अपने नए प्रधानमंत्री का चुनाव करने के लिए पहली बार अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे. नवयुवकों के लिए विकास मुख्य मुद्दा है, तथा कामक़ाज़ी महिलाएं शासन से सुरक्षा की अपेक्षा रखती हैं. जनता की आशंकाएं इस बात को लेकर अधिक हैं कि क्या नए प्रधानमन्त्री उनकी आकांक्षाओं पर खरे उतरेंगे.

जनता से अपील
जनता से भी यह अपेक्षा है कि इस अंतरिम समय में चेतन होकर अपने मत के बारे में जरूर सोचें. चुंकि इस बार प्रधानमन्त्री पद के लिए विकल्पों की घोषणा लगभग हो चुकी है, इसलिए उन्हें अपने मत को निश्चित करने में आसानी होगी. साझा सरकारें देश की अपेक्षा पर पूरी तरह से खरी नहीं उतरी हैं.  बहुमत वाली पार्टी के लिए पांच वर्ष तक बहुमत बनाये रखने के लिए अन्य घटकों से गुप्त समझौतों के कारण प्रधानमन्त्री के हाथ बंधते हैं. वे भ्रष्टाचार के मामलों में मजबूती से कार्यवाही नहीं कर सकते. यूपीए-1 मंत्रिमंडल बनाने के समय घटकों से समझौते करने की मुश्किलें राडिया टेप्स प्रकरण से प्रकाश में आयी. इसलिए जनता से भी अपेक्षा है कि एक पार्टी को बहुमत देकर प्रधानमन्त्री को एक मजबूत चार पाये का सिंहासन दें.

राजनैतिक पार्टीयों से अपेक्षा  
देश की बड़ी राजनैतिक पार्टीयाँ  भारत की विशिष्ट सभ्यता को समझकर अगली लोकसभा के लिए अपनी मानसिकता  बनाएं. देश की समस्त जनता को रामराज्य जैसी राजनीतिक व्यवस्था पर हमेशा से विश्वास रहा है. उन्ही मान्यताओं के चलते देश की अधिकाँश जनता प्रधानमंत्री को राजा के रूप में देखती है. वह केवल प्रधानमंत्री को जानती है. यहाँ तक की समस्त राज्यों की जनता भी प्रधानमंत्री की ही ओर उन्मुख होती है. प्रधानमन्त्री किस पार्टी से सम्बन्धित हैं यह भी जनता के लिए कोई ख़ास मायने नहीं रखता. देश की वरिष्ठ पार्टीयाँ प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करते समय यह निश्चित करें कि उम्मीदवार के लिए सभी सम्प्रदाय तथा जाति एक समान हैं. "एकं सत्य विप्रा बहुधा वदन्ति" अर्थात विभिन सम्प्रदायों एवं जातिओं आदि के महापुरुष केवल सच के पुजारी रहे थे. इसलिए इस देश में सभी सम्प्रदायों एवं जाति का सम्मान बराबर रूप से होना चाहिए.  

प्रधानमन्त्री पार्टी द्वारा जनता को दिया गया एक नायाब तोहफा हो, जिसे देने के बाद पार्टी उसे स्वयं से मुक्त कर देश को सौंप दे. पार्टी उसे अपना मंत्रिमंडल बनाने की पूरी स्वतंत्रता दे. अगले पांच वर्ष पार्टी प्रधानमन्त्री का कवच बनकर विपक्ष से लोहा ले तथा पार्टी को अनुशासित कर बहुमत बनाए रखे. 


प्रधानमन्त्री से संघर्ष की अपेक्षा
देश में केवल एक नेता होता है. प्रधानमन्त्री के रूप में संविधान उसे कार्यपालिका के प्रमुख का दर्ज़ा देता  है. सभी कार्य प्रधानमन्त्री नहीं कर सकते इसलिए मंत्रिमंडल में कार्य को विभागों में विभाजित कर प्रत्येक विभाग का एक मंत्री बनाया जाता है. मंत्रिमंडल के सदस्य चर्चा के लिए अपने-अपने विषयों पर योजनाएँ बना कर लाते हैं. प्रधानमन्त्री धैर्यपूर्वक विषयों को पूरी तरह समझकर, स्वयं का मत बनाकर ही  चर्चा आरम्भ करें. भगवान् महावीर के "अनेकान्तवाद" सिद्धांत के अनुसार सच के लिए संघर्ष जरूरी है. जब तक किसी विषय पर विरोधी मत नहीं आता सच दिखाई नही देता. इसलिए मंत्रिमंडल के सदस्य भी ऐसे हों कि मतैक्य बनाना प्रधानमन्त्री के लिए एक चुनौती हो. वे लचीलापन भी दिखायें, मत विभाजन भी करायें, परंतु तब तक संघर्ष करते रहे जब तक कि बहुमत उनके पक्ष में न आ जाये. किसी भी विषय पर यदि बहुमत उनके पक्ष में नहीं है तो दबाव में बात मानने की बजाय पद छोड़ने में संकोच न करें. मंत्रिमंडल से किसी को बाहर करना तो उनके अधिकार में है ही.  

यजुर्वेद में कहा है कि यदि भूमि से उपज लेनी है तो उसे खोदना जरूरी है, परन्तु इसके बाद उसे चेतन समझ उसका उपचार करना भी जरूरी है. इसलिए मंत्रिमंडल में संघर्ष के बाद सौहार्द को वापिस लाना भी प्रधानमन्त्री का ही दायित्व है.


भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए विकेंद्रीकरण
देश में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण प्रशासन में जनता की भागीदारी है, जो बहुत कम है. आज़ादी के पूर्व से चली आ रही ब्रिटिश शासन की मानसिकता को तिलांजलि दे, सन 1993 में संविधान के 73 तथा 74 वें संशोधनों द्वारा ढाई लाख से ऊपर पंचायतों तथा चार हज़ार नगरपालिकाओं को सत्ता में भागीदार बनाकर शासन में एक तीसरा स्तर जोड़ा गया था. परन्तु केंद्र सरकार तथा लगभग सभी राज्य सरकारों ने पिछले बीस वर्षों में सत्ता के विकेंद्रीकरण का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया. किसी भी ईमानदार नेता के लिए भ्रष्टाचार मजबूरी ना बने इसकी पर्याप्त व्यवस्था करना आवश्यक है.

महंगाई के कारणों को जानने के लिए वैश्विक बाज़ार को भी समझना जरूरी है. विश्व बैंक आदि वैश्विक संस्थाएं पिछले बीस वर्षों से लगातार सभी देशों को अपने बाज़ारों को मुक्त करने के लिए वहाँ की सरकारों पर दबाव डालती रही हैं. इसका लाभ उठाकर कुछ पश्चिमी देशों ने विश्व के मुख्यतः खाद्यान्न तथा पेट्रोलियम बाज़ारों पर अपना कब्ज़ा कर रखा है. उनकी बड़ी पूंजी की उठा-पटक ने देश के खाद्यान्न क्षेत्र के पारंपरिक आढती व्यापार को बहुत नुकसान पहुंचाया है. साथ ही विश्व स्तर पर भी उपरोक्त पदार्थों के दामों में  वृद्धि हुई है. देश की केंद्रीभूत सत्ता इन दबावों का प्रतिकार करने में असमर्थ रही है, जिसके चलते भ्रष्टाचार से भी महंगाई बढी है.

विकास के गतिरोध  
शुद्ध वायु के रोम-रोम में प्रवेश से ही एक स्वस्थ शरीर तैयार होता है. विकेंद्रीकरण से देश के शासन तंत्र को वैसी ही शक्ति मिलेगी जो देश के तीव्र विकास के लिए बहुत आवश्यक है. गांवों के स्तर पर अभी शासन कौशल की बहुत कमी है. साथ ही कम्प्यूटर तथा इंटरनेट आदि आधुनिक संचार साधनों के उपयोग में भी उन्हें प्रशिक्षित करना जरूरी है. राज्य सरकारों को प्रशिक्षण की यह सुविधा ग्राम स्तर पर ही उपलब्ध करानी होगी. प्रधानमन्त्री राष्ट्रीय विकास परिषद् में इस विषय पर बातचीत कर राज्यों को एक समय सीमा में इस काम को पूरा करने का दायित्व दे सकते हैं. इस एक कदम से वे देश की 60 से 70 प्रतिशत जनता के चहेते बन जायेंगे. 

शहरों की समस्या भिन्न है. मुंबई आदि महानगर देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं. देश के मुख्य निर्यात उद्योग आईटी, कार उत्पादन इन्ही शहरों से चलते हैं. देसी तथा विदेशी निवेश भी इन्ही शहरों में आता है. इसलिए उद्योगों के लिए जरूरी कुशल कारीगर , भूमि, बिजली, अन्य  नागरिक सुविधाओं को उपलब्ध कराना और उनका रख-रखाव, बहुत जरूरी हो जाता है. परन्तु ब्रिटिश शासन शासन काल से ही महानगरों के योजनाबद्ध विकास पर ध्यान नहीं दिया गया है. सन 1993 के 74 वे संशोधन द्वारा महानगरों के योजनाबद्ध विकास के लिए राज्यों को महानगर योजना कमेटीयों का गठन कर उचित सत्ता हस्तान्त्तरण के लिये कहा गया था. परन्तु राज्य सरकारें ने इन शहरों पर अपना वर्चस्व कम होने की आशंका से पिछले बीस वर्षों में इस दिशा में कोई कारगर प्रयास नहीं किया है.

देश में लगभग 8 हज़ार छोटे शहर हैं. इनकी आबादी भी तेज़ी से बढ़ रही है. साथ ही पिछले दो दशकों में तकनीकी तथा प्रबंधन शिक्षा के अप्रत्याशित विकास ने इन शहरों को भी विकास की ओर उन्मुख कर दिया है. इन 8 हज़ार छोटे शहरों में से केवल 4 हज़ार ही विधिवत स्थापित हैं अर्थात उनमें नगपालिकाएं हैं. परंतू इन विधिवत स्थापित शहरों की भी सफाई आदि नागरिक सुविधाओं को देने में प्रशासन के सामने राजनीतिक हस्तक्षेप, कर्मचारिओं की यूनियन, जनता के प्रतिनिधिओं से ताल-मेल आदि अनेक समस्याएं रहती हैं. इन समस्याओं के समाधान पर EPW March 22, 1997 में प्रकाशित हुई सूरत शहर के कायापलट की कहानी प्रशासनिक अधिकारिओं के अलावा देश के नए नेताओं के लिए भी शिक्षाप्रद होगी. प्रस्तुत लेखक ने इस कहानी का हिदी रूपांतर "शहरी प्रशासन के विवाद बिंदु" नाम से प्रकाशित किया है.

अन्य 4 हज़ार छोटे शहर जो देश के विकास में और अधिक योगदान दे सकते हैं. परन्तु पंचायतों के भरोसे न्यूनतम नागरिक सुविधाओं से वंचित होने से कुछ अधिक करने में असमर्थ हैं. इनपर राज्य सरकारों का अधिकाँश में कोई ध्यान नहीं है.

विकास कार्यों की समीक्षा
निचले स्तर पर सत्ता के कार्यों की समीक्षा प्रधानमन्त्री तथा उनके मंत्रिमंडल का मुख्य कार्य होना चाहिए. संविधान में चुनाव आयोग (EC), केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC) तथा कैग Comptroller and Auditor General) को स्वायत्ता दी हुई है. केन्द्रीय जांच विभाग (CBI)  गृह मंत्रालय के अंतर्गत होते हुए भी काफी हद तक स्वायत्त है. विकेंद्रीकरण के चलते उपरोक्त संस्थाओं का जबरदस्त विस्तार कर देश के कोने-कोने की खबर रख भ्रष्टाचारिओं को सख्त सज़ा देने से जनता पूरे उत्साह से विकास में तत्पर होगी. महाभारत में युद्धोपरांत युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने सुशासन के लिए दंड की महिमा का वर्णन किया था.

महिला सुरक्षा
खाली दिमाग शैतान का घर होता है. महिलाओं के प्रति अपराधों के पीछे नौजवानों में बढती हुई बेरोज़गारी एवं नैतिक मूल्यों का ह्रास है. आज देश में अनेकों नौजवान तकीनकी तथा प्रबंधन की शिक्षा पाकर भी खाली बैठे हैं, जिनमें से अनेक तो गाँवों से हैं. आज ढाई लाख पंचायतें तकनीकी एवं प्रबंधन ज्ञान की कमी से देश के विकास में योगदान नहीं दे पा रहीं हैं. बेरोज़गारी दूर करने के अन्य प्रयत्नों से महिलाओं के प्रति अपराधों में भी कमी आएगी.  

आखिर में प्रधानमन्त्री पद के संभावित उमीदवारों के लिए एक सुझाव: इसमें कोई शक नहीं कि उच्चतम पदों पर काम करने में जबरदस्त दबाव झेलने पड़ते हैं, जाने-अनजाने गलतियाँ होना भी स्वाभाविक है. जेल जाने की आशंका से पद छोड़ने में भी डर लगता है. परन्तु यदि आपको अपनी गलतियों का अहसास है, और आप वास्तव में सर्वोपरि, सर्व सामर्थ्य युक्त जनता से क्षमा माँगना चाहते हैं तो विश्वास करें इस देश की जनता विशाल हृदय की है, वह तालिबानी क़ानून नहीं मानती, वह आपको अवश्य माफ़ कर आगे काम करने के लिए प्रोत्साहित करेगी.   


अगले 7-8 महीने बाद जब जनता अगली सरकार चुनेगी तो निश्चित ही उसके मानस पटल पर ये एजेंडे भी होंगे. 

Kanhaiya Jha
(शोध छात्र)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University, Bhopal, Madhya Pradesh
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