जनता सर्वोपरि है

ये विचार सुप्रीम कोर्ट के हैं. सन 1991 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना कर मेघालय सरकार को धारा 356 के अंतर्गत बर्खास्त कर दिया गया था. मामले को तुरंत संज्ञान में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के गवर्नर को भी कुछ हिदायतें भेजी थीं. परंतू दोनों सदनों से स्वीकृति होने पर राष्ट्रपति की  घोषणा पर विधान सभा बर्खास्त कर दी गयी. यह मामला बोम्मई बनाम भारत सरकार (1994) नाम से जाना जाता है. इस पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की घोषणा को निरस्त कर दिया था. कोर्ट के सामने विपक्ष ने यह दलील दी कि कार्यपालिका का भाग होने से गवर्नर आपके आदेशों को मानने से इनकार कर सकता था. इस पर तीव्र प्रतिक्रिया करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने धारा 144 की याद दिलाई जिसके तहत सभी नागरिक एवं न्यायिक अधिकारिओं का यह दायित्व है की वे सुप्रीम कोर्ट तथा उसके निर्देशों के पक्ष में कार्य कर उनके क्रियान्वन में सहायता करें. इसी मामले में एक प्रश्न पर कि सरकार के तीनों अंगों - न्यायपालिका, कार्यपालिका, तथा विधानपालिका में कौन बड़ा है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा की यह बेकार की बहस है, हाँ इसमें कोई शक नहीं कि जनता सर्वोपरि है.

यह सच है की सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णयों से जनता सर्वोपरि महसूस करती है. जनता की ख़ुशी ही न्यायाधीशों को शक्ति देती है. प्रजातंत्र में सुशासन का आधार सरकार के तीनो अंगों के मध्य संघर्ष है. भगवान् महावीर के "अनेकान्तवाद"  सिद्धांत के अनुसार सच के लिए संघर्ष जरूरी है. संसद में भी सच के लिए पक्ष तथा विपक्ष के बीच संघर्ष जरूरी है. जब तक किसी विषय पर विरोधी मत नहीं आता सच दिखाई नही देता. यदि सरकार का कोई अंग संघर्ष से विरत होता है तो सुशासन को धक्का लगता है. साथ ही वह अंग जनता का विश्वास भी खो बैठता है. जनता का विश्वास कि देश में क़ानून का राज्य चलता है - यह ही केवल उसकी शक्ति है, जिसकी वजह से ही वह सर्वोपरि है.
नरसिम्हा राव के शासन के दौरान (1991-96) तांत्रिक चंद्रास्वामी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अनेक वर्षों से लंबित अपराधिक मामलों की जांच-पड़ताल सरकार की तीन संस्थाएं - सीबीआई, राजस्व विभाग तथा दिल्ली पुलिस, कर रहीं थीं. सुप्रीम कोर्ट की अनेक चेतावनीयों के बाद भी ये अपनी जांच पूरी नहीं कर रहे थे, तथा चंद्रास्वामी को गिरफ्तार करने से कतरा रहे थे. राजस्व सचिव, जिनका विभाग फेरा के अंतर्गत करोड़ों रुपये के घोटालों की जांच कर रहा था, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को जबाब देते हुए कहा कि आप हमसे किसी चमत्कार की आशा न करें, आपके चाहने पर भी हम उनके खिलाफ तुरंत कार्यवाही नहीं कर सकते.

सीबीआई ने भी कुछ संतोषजनक जबाब नहीं दिया था. सुप्रीम कोर्ट के अलावा सीबीआई के कुछ पूर्व अधिकारिओं का, जिन्होंने पहले इन मामलों में जांच-पड़ताल की थी, यह निश्चित मत था कि सीबीआई जान-बूझ कर देरी कर रही है. मार्च 1991 में संस्था के एक सह-निदेशक जब इसी मामले की जांच पूरी करने वाले थे तो उनका अचानक तबादला कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने संस्था द्वारा जांच-पड़ताल में की जा रही देरी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि वे लोग जिनके "विशेष सम्बन्ध" हैं कुछ भी कर के बच जाते हैं.   
उस समय चंद्रास्वामी के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव से सम्बन्ध जग-जाहिर थे. श्री राव पर भी अविश्वास प्रस्ताव के विरुद्ध अपनी सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देने के आरोप लगे थे. इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सन 1997 में, जब श्री राव प्रधानमन्त्री नहीं थे,  उन्हें तथा उनके 18 सहयोगी राजनेताओं को न्यायिक जांच के समक्ष पेश होने को कहा था. श्री राव ने संविधान से सांसदों को प्राप्त विशेषाधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट का आदेश मानने से इनकार कर दिया था. सन 2000 में अनेक वर्षों की न्यायिक प्रक्रिया के बाद इसी मामले में श्री राव एवं उनके एक वरिष्ठ मंत्री को सज़ा भी मिली थी.

देश के राजनीतिक वातावरण से सभी परिचित थे. जिसके बारे में बाद में पूर्व राष्ट्रपति श्री एपीजे अब्दुल कलाम ने सांसदों को इंगित कर कहा था कि "सरकार के लिए उपयुक नंबर जुटाने के लिए वैधानिक सीटों को खरीदना एक मजबूरी है. ये सीटें भी संदिग्ध एवं अलोकतांत्रिक तरीकों से हासिल की जाती हैं, जिसकी वजह से जनता अनेक बार प्रजातंत्र के प्रति आशंकित होती रही है". सभी जांच संस्थाएं किसी न किसी मंत्रालय के अंतर्गत आती थीं. यह सही है कि किसी निर्दोष को सजा न मिले, परन्तु यह भी जरूरी था कि न्यायालय की अकर्मण्यता के सन्देश से अन्य "विशेष सम्बन्ध" वाले व्यक्ति क़ानून की अवहेलना करने लगें. सुप्रीम कोर्ट अपने पूर्व निर्णयों के अनुसार सरकार के किसी भी अंग के कामों की समीक्षा करने के लिए अधिकृत था, जिससे सभी को उपयुक्त सन्देश भेजा जा सकता था.

क़ानून में जनता के विश्वास के लिए अन्याय का तुरंत प्रतिकार करना बहुत जरूरी होता है. यह सही है कि मेघालय सरकार वाला मामला धारा 356 से सम्बन्धित होने के कारण एक गंभीर मसला था और सही निर्णय के लिए तीन वर्ष लगे. यदि राष्ट्रपति की विधान सभा बर्खास्त करने की घोषणा को किसी तरह भी नहीं रोका जा सकता था तो तुरंत मीडिया का सहारा लेकर सुप्रीम कोर्ट को जनता का विश्वास अवश्य ही जीतना चाहिए था.
संविधान की धारा 32 के माध्यम से न्यायालय जनता से जुड़ता है. इसके अंतर्गत न्यायालय किसी भी अन्याय का स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही कर सकता है. शास्त्रों में इसकी उपमा राजा इंद्र की हज़ार आँखों के रूप में मिलती है, जिनका उपयोग कर वह ऋषिओं की तपस्या की भी समीक्षा करता था. अन्याय की शुरुआत बहुत ही अहानिकारक रूप में होती है, जिसकी अनदेखी करने पर वह बहुत तेज़ी से वट वृक्ष बन सकता है. सुप्रीम कोर्ट से जनता ऐसी ही सूक्ष्म दृष्टि की अपेक्षा रखती है, जिसका परिचय वह चंद्रास्वामी की जांच कर रहे पूर्व सहनिदेशक के तबादले पर स्टे आर्डर दे कर, कर सकता था.     


आज निचले स्तर की अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक असंख्यों मामले निपटारे के लिए पड़े हैं. यदि सुप्रीम कोर्ट कथनी के साथ-साथ करनी में भी विश्वास करता है तो जनता को सर्वोपरि करने के लिए समस्या का समाधान भी उसे ही करना होगा. न्यायिक प्रक्रिया में वरिष्ठ होने के नाते यह उसका ही दायित्व है. भारतमाता की रक्षा के लिए सीमा पर लड़ने वाला एक साधारण सैनिक भी गोली लगने के डर से यदि फ्रंट छोड़ दे तो पूरा देश युद्ध हार सकता है. यह जनता ही वह भारतमाता है जिसका विश्वास बनाए रखना के लिए संघर्ष तो करना ही होगा.

Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University, Bhopal, Madhya Pradesh
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